रविवार, 25 जनवरी 2009

मेरे बाऊ जी

सन्नाटे और तन्हाईयों की कई दीवारे गिराने के बाद न जाने कैसे आज मैं यादों के उस कमरे में पहुँच गया जो मेरे बाऊ जी मुझे किसी अमानत की तरह सौप कर किसी अनजान सफर पर चल दिए.हसरतों ख्वाहिशों और न जाने कितनी रूमानी तम्मनाओं से भरा हुआ था ये कमरा जो बाऊ जी अपने से बचपन से सहेज कर यहाँ तक लाये थे. या फ़िर विरासत में शायद मेरे बाऊ जी को उनके बाऊ जी ने दिया होगा. तमन्नाओं के कई बक्से उन्होंने खोलो और दिखलाये और कई अनछुए छोड़ कर ही चले गए. तम्मंनाये कुछ ऐसी थी जिनमे ख़ुद कुछ कर दिखने का जोश और कुछ ऐसी थी जिनमे अपने चाहने वालों के कहीं पहुँच जाने का जज्बा भरा हुआ था. अक्सर शाम के धुंधलके में किसी तिलिस्म की भांति खुलती हुई उनके बचपन की बातें मुझे रोमांचित कर दिया करती थी. जिंदगी भर किसी मुसाफिर की भांति हजारों दिलों की हसरतों को पूरा करने के लिए कई तमन्नाओं का बोझ उठाये चलने वाले मेरे बाऊ जी थोड़ा सा छेड़ते ही अपने किस्से कहानियो में खो जाते थे. शाम को हमारे घर के सामने बने पार्क और घर के बीच की बाई पास रोड पर अक्सर हम दोनों कुर्सी डाल कर बैठ जाते थे. एक चाय के प्याले के साथ वो पचासों साल पीछे के सफर पर निकला जाया करते थे.........

1 टिप्पणी:

  1. सबके बाऊ जी व दादाजी की कहानी, सही है, अपने बाबाजी की कहानियां याद आ गई

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