सफर लंबा हो तो तुम साथ न दे पाओगे,
बाद मरने के कब्र से ही अलविदा कह जाओगे .
हमने देखे हैं जी भर के ज़माने के सितम
कुछ भी बाकी न रहा अब क्या दिखाओगे.
मिट्टी की चीजों को मिल जाने दे मिट्टी में,
कब तक इस मिट्टी को देख के जी बहलाओगे.
कई रातों का जागा था तेरा बीमार ऐ मोहब्बत
अब नही उठने वाला अब क्या करके जगाओगे.
आजकल ख़त कबूतर नही लाते उनके न सही,
वो रुत, वो फिजायें, वो मौसम कैसे भूल पाओगे.
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009
गुरुवार, 29 जनवरी 2009
बूढी ऑंखें
उन बूढी आँखों का नक्श उभारने के लिए शब्दों का पिरामिड कई बार खड़ा करने की कोशिश की पर हर बार नाकाम रहा. क्रूरता और ममत्व के भावों का संतुलित शब्दों में वर्णन इतना आसान न था जो कि उन आंखों में अक्सर आते जाते रहते थे. मेरा परिचय उन आँखों से तब हुआ जब शायद मैं ख़ुद अपने आप से भी भली भांति परिचित न था. उनके मकान का आधा भाग हम लोगो ने ख़रीदा था वैसे तो वो हमारे ख़रीदे मकान कि पूर्व स्वामिनी थी पर रिश्ते में हम उन्हें नानी कहा करते थे.माता जी द्वारा पुकारे जाने वाले संबोधन नानी को हम बच्चो ने भी उसी रूप में अपना लिया था.इस तरह वो बच्चे से लेकर बूढों तक की नानी कहलाने लगी थीं.चार प्राणियों का छोटा सा कुनबा था उनका .पति, पुत्र,बहू,और स्वयं वो. पति इलाके के मशहूर पंडितों में से हुआ करते थे. उनका नाम हमारे नए मकान के लिए लैंड मार्क का काम करता था. वैसे उनकी ५०-५५ की उम्र नानी संबोधन के कदापि अनुरूप नही थी किंतु रिश्तों के मकड़जाल के किस धागे से माँ ने उन्हें नानी कहना शुरू किया पता नही.
अपनी छत पर खेलते हुए जब हमारी गेंद उनकी छत पर चली जाती और हम भाग कर उठाने दौड़ते तो हमारे क़दमों की आहट सुनकर वो भी छत पर चली आतीं और शुरू होता उन आँखों का रौद्र रूप -"नासकाटों ! इतनी बड़ी छत कम पड़ रही है तुम सबको उधम मचाने के लिए. जो इधर कूद कर चले आए. हम कहे दे रहे बबलू की मम्मी !हमका ऐ सब बिल्कुल पसंद नही है.अबकी ई सब इधर आए तो ठीक नही होगा.
उनकी कर्कश वाणी और जलती आंखों के बाद शुरू होता माँ का रौद्र रूप. पुराने मकान की छत कमजोर होने का भय इस तरह उनके सीने में बसा था की बस क़दमों की आहट से ही उन्हें लगने लगता था कि कोई उनके सीने पर चल रहा है. और इसी क्रम में जब कभी नाना पंडिताई करके फल लाते तो अपनी बहू से बचा कर चुपचाप हम लोगो को पकड़ा देती थीं. तब नजर आता था मुझे उन आँखों में वो दूसरा रूप ममत्व का. ले ! ले जा !चुप्पे खा लेना .इस शब्दों को सुनने के बजाय मैं उन आँखों के भावों को पढ़ा करता था. परिवार के शेष सदस्यों पर उन्ही की हुकूमत चलती थी. सुबह चार बजे उठने के साथ ही उनकी हुकूमत शुरू हो जाती थी.पानी भरना, पूजा करना ,झाडू बुहारू करना ये सब उनकी दिनचर्या का अंग था. और इसी क्रम में अपनी आलसी बहू को कोसते रहना भी नियम से होता था.काल चक्र पर धीरे धीरे समय खिसकता जा रहा था.बच्चे बड़े हो चले थे,बड़े बूढे,और बूढे ......बूढे क्या हुए ये शायद आज तक कोई नही जान पाया. शायद जीवन के दृश्य पटल पर भागते भागते वो छितिज के पार चले गए थे. और छितिज के पार जाने वालों में एक दिन पंडित नाना का भी नाम लिख दिया गया था. वो विशाल भीमकाय काया फूलो से ढकी जमीन पर रखी हुई थी और मैं आज भी रोती बिलखती नानी की आँखों में आते जाते भावों को देख रहा था.अपनी एक कड़कती आवाज से सम्पूर्ण घर पर हुकूमत कायम कर लेने वाली नानी पर नाना को छितिज से वापस बुला सकने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी थी.
अपनी छत पर खेलते हुए जब हमारी गेंद उनकी छत पर चली जाती और हम भाग कर उठाने दौड़ते तो हमारे क़दमों की आहट सुनकर वो भी छत पर चली आतीं और शुरू होता उन आँखों का रौद्र रूप -"नासकाटों ! इतनी बड़ी छत कम पड़ रही है तुम सबको उधम मचाने के लिए. जो इधर कूद कर चले आए. हम कहे दे रहे बबलू की मम्मी !हमका ऐ सब बिल्कुल पसंद नही है.अबकी ई सब इधर आए तो ठीक नही होगा.
उनकी कर्कश वाणी और जलती आंखों के बाद शुरू होता माँ का रौद्र रूप. पुराने मकान की छत कमजोर होने का भय इस तरह उनके सीने में बसा था की बस क़दमों की आहट से ही उन्हें लगने लगता था कि कोई उनके सीने पर चल रहा है. और इसी क्रम में जब कभी नाना पंडिताई करके फल लाते तो अपनी बहू से बचा कर चुपचाप हम लोगो को पकड़ा देती थीं. तब नजर आता था मुझे उन आँखों में वो दूसरा रूप ममत्व का. ले ! ले जा !चुप्पे खा लेना .इस शब्दों को सुनने के बजाय मैं उन आँखों के भावों को पढ़ा करता था. परिवार के शेष सदस्यों पर उन्ही की हुकूमत चलती थी. सुबह चार बजे उठने के साथ ही उनकी हुकूमत शुरू हो जाती थी.पानी भरना, पूजा करना ,झाडू बुहारू करना ये सब उनकी दिनचर्या का अंग था. और इसी क्रम में अपनी आलसी बहू को कोसते रहना भी नियम से होता था.काल चक्र पर धीरे धीरे समय खिसकता जा रहा था.बच्चे बड़े हो चले थे,बड़े बूढे,और बूढे ......बूढे क्या हुए ये शायद आज तक कोई नही जान पाया. शायद जीवन के दृश्य पटल पर भागते भागते वो छितिज के पार चले गए थे. और छितिज के पार जाने वालों में एक दिन पंडित नाना का भी नाम लिख दिया गया था. वो विशाल भीमकाय काया फूलो से ढकी जमीन पर रखी हुई थी और मैं आज भी रोती बिलखती नानी की आँखों में आते जाते भावों को देख रहा था.अपनी एक कड़कती आवाज से सम्पूर्ण घर पर हुकूमत कायम कर लेने वाली नानी पर नाना को छितिज से वापस बुला सकने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी थी.
रविवार, 25 जनवरी 2009
मेरे बाऊ जी
सन्नाटे और तन्हाईयों की कई दीवारे गिराने के बाद न जाने कैसे आज मैं यादों के उस कमरे में पहुँच गया जो मेरे बाऊ जी मुझे किसी अमानत की तरह सौप कर किसी अनजान सफर पर चल दिए.हसरतों ख्वाहिशों और न जाने कितनी रूमानी तम्मनाओं से भरा हुआ था ये कमरा जो बाऊ जी अपने से बचपन से सहेज कर यहाँ तक लाये थे. या फ़िर विरासत में शायद मेरे बाऊ जी को उनके बाऊ जी ने दिया होगा. तमन्नाओं के कई बक्से उन्होंने खोलो और दिखलाये और कई अनछुए छोड़ कर ही चले गए. तम्मंनाये कुछ ऐसी थी जिनमे ख़ुद कुछ कर दिखने का जोश और कुछ ऐसी थी जिनमे अपने चाहने वालों के कहीं पहुँच जाने का जज्बा भरा हुआ था. अक्सर शाम के धुंधलके में किसी तिलिस्म की भांति खुलती हुई उनके बचपन की बातें मुझे रोमांचित कर दिया करती थी. जिंदगी भर किसी मुसाफिर की भांति हजारों दिलों की हसरतों को पूरा करने के लिए कई तमन्नाओं का बोझ उठाये चलने वाले मेरे बाऊ जी थोड़ा सा छेड़ते ही अपने किस्से कहानियो में खो जाते थे. शाम को हमारे घर के सामने बने पार्क और घर के बीच की बाई पास रोड पर अक्सर हम दोनों कुर्सी डाल कर बैठ जाते थे. एक चाय के प्याले के साथ वो पचासों साल पीछे के सफर पर निकला जाया करते थे.........
शनिवार, 17 जनवरी 2009
वस्ल और हिज्र कि बातें चलो बेमानी कर दें,
मिलें कुछ यूं कि बिछड़ने को शर्म से पानी पानी कर दें।
चाँद सितारों से सजी एक रात तेरे पहलू में चली आई है,
तेरे पहलू में हम भी सिमट के इस रात को रूमानी कर दें।
मेरी मोहब्बत का इश्तहार तेरे चेहरे पे नज़र आता है,
आ किसी दिन मिल के इसे सबकी ज़ुबानी कर दे।
कल शाम फिर एक दर्द नें दस्तक मारी ,
हमने तो समझा था कि आज मौत कि बारी है।
पर मौत पाना जिंदगी जितना आसान नहीं ए मासूम !
मौत का अपना एक रुतबा है जिंदगी तो बेचारी है।
मिलें कुछ यूं कि बिछड़ने को शर्म से पानी पानी कर दें।
चाँद सितारों से सजी एक रात तेरे पहलू में चली आई है,
तेरे पहलू में हम भी सिमट के इस रात को रूमानी कर दें।
मेरी मोहब्बत का इश्तहार तेरे चेहरे पे नज़र आता है,
आ किसी दिन मिल के इसे सबकी ज़ुबानी कर दे।
कल शाम फिर एक दर्द नें दस्तक मारी ,
हमने तो समझा था कि आज मौत कि बारी है।
पर मौत पाना जिंदगी जितना आसान नहीं ए मासूम !
मौत का अपना एक रुतबा है जिंदगी तो बेचारी है।
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