रविवार, 21 अक्टूबर 2007

एक था मच्छर
एक रात मैं सो रहा था ,
मीठे सपनो में में खो रहा था ।
कि अचानक,
एक सज्जन मेरे कर्ण द्वारे पे आये,
अपनी मीठी बांसुरी के स्वर खड़खड़ाये
साथ ही मेरे कपोलों पे चुम्बन अंकित कर हौले से मुस्कुराये।
उनकी चुम्बन की अदा हमको कम भायी,
सो मैंने झट ओढ़ ली रजाई।
लेकिन आज जनाब मूड में थे ,
सो हमको तेजी से ढूँढ रहे थे।
थोडी देर में उन्होने कामयाबी पायी,
और ढूँढ ली मेरी रजाई।
अबकी वो पूरे प्रबंध से आये थे,
बीवी बच्चे भी साथ लाये थे।
बीवी बोली- सुनो जी कल उपवास रखना है,
इसीलिए आज तो imergency स्टॉक भी भरना है।
सज्जन बोले-फ़िक्र मत कर भाग्यवान,
आज तो जाम से जाम टकरायेंगे,
सारी रात पियेंगे और पिलायेंगे।
उनकी इन हरकतों से मेरा दिमाग भन्नाया,
और मैंने गुस्से में हाथ घुमाया,
बेटा बच गया पर बाप चिल्ल्लाया,
कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों ,
अब तुम्हारे हवाले इसका तन साथियों।
अपने उनका ये हश्र देख के बीवी,
कुछ चढ़ उदासी में गहराई,
फिर वीर क्षत्राणी की तरह जोर से चिल्लाई,
बेटे-इस दुष्ट को मजा चखाना है,
इसको सारी रात जगाना है,
और दूध का कर्ज चुकाना है.

शनिवार, 20 अक्टूबर 2007

ग़मों कि भीड़ घेरे न हो ऐसा कोई लम्हा न था.
कब्र में लेटा हुआ मासूम कभी इस तरह तनहा न था।