सफर लंबा हो तो तुम साथ न दे पाओगे,
बाद मरने के कब्र से ही अलविदा कह जाओगे .
हमने देखे हैं जी भर के ज़माने के सितम
कुछ भी बाकी न रहा अब क्या दिखाओगे.
मिट्टी की चीजों को मिल जाने दे मिट्टी में,
कब तक इस मिट्टी को देख के जी बहलाओगे.
कई रातों का जागा था तेरा बीमार ऐ मोहब्बत
अब नही उठने वाला अब क्या करके जगाओगे.
आजकल ख़त कबूतर नही लाते उनके न सही,
वो रुत, वो फिजायें, वो मौसम कैसे भूल पाओगे.
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009
गुरुवार, 29 जनवरी 2009
बूढी ऑंखें
उन बूढी आँखों का नक्श उभारने के लिए शब्दों का पिरामिड कई बार खड़ा करने की कोशिश की पर हर बार नाकाम रहा. क्रूरता और ममत्व के भावों का संतुलित शब्दों में वर्णन इतना आसान न था जो कि उन आंखों में अक्सर आते जाते रहते थे. मेरा परिचय उन आँखों से तब हुआ जब शायद मैं ख़ुद अपने आप से भी भली भांति परिचित न था. उनके मकान का आधा भाग हम लोगो ने ख़रीदा था वैसे तो वो हमारे ख़रीदे मकान कि पूर्व स्वामिनी थी पर रिश्ते में हम उन्हें नानी कहा करते थे.माता जी द्वारा पुकारे जाने वाले संबोधन नानी को हम बच्चो ने भी उसी रूप में अपना लिया था.इस तरह वो बच्चे से लेकर बूढों तक की नानी कहलाने लगी थीं.चार प्राणियों का छोटा सा कुनबा था उनका .पति, पुत्र,बहू,और स्वयं वो. पति इलाके के मशहूर पंडितों में से हुआ करते थे. उनका नाम हमारे नए मकान के लिए लैंड मार्क का काम करता था. वैसे उनकी ५०-५५ की उम्र नानी संबोधन के कदापि अनुरूप नही थी किंतु रिश्तों के मकड़जाल के किस धागे से माँ ने उन्हें नानी कहना शुरू किया पता नही.
अपनी छत पर खेलते हुए जब हमारी गेंद उनकी छत पर चली जाती और हम भाग कर उठाने दौड़ते तो हमारे क़दमों की आहट सुनकर वो भी छत पर चली आतीं और शुरू होता उन आँखों का रौद्र रूप -"नासकाटों ! इतनी बड़ी छत कम पड़ रही है तुम सबको उधम मचाने के लिए. जो इधर कूद कर चले आए. हम कहे दे रहे बबलू की मम्मी !हमका ऐ सब बिल्कुल पसंद नही है.अबकी ई सब इधर आए तो ठीक नही होगा.
उनकी कर्कश वाणी और जलती आंखों के बाद शुरू होता माँ का रौद्र रूप. पुराने मकान की छत कमजोर होने का भय इस तरह उनके सीने में बसा था की बस क़दमों की आहट से ही उन्हें लगने लगता था कि कोई उनके सीने पर चल रहा है. और इसी क्रम में जब कभी नाना पंडिताई करके फल लाते तो अपनी बहू से बचा कर चुपचाप हम लोगो को पकड़ा देती थीं. तब नजर आता था मुझे उन आँखों में वो दूसरा रूप ममत्व का. ले ! ले जा !चुप्पे खा लेना .इस शब्दों को सुनने के बजाय मैं उन आँखों के भावों को पढ़ा करता था. परिवार के शेष सदस्यों पर उन्ही की हुकूमत चलती थी. सुबह चार बजे उठने के साथ ही उनकी हुकूमत शुरू हो जाती थी.पानी भरना, पूजा करना ,झाडू बुहारू करना ये सब उनकी दिनचर्या का अंग था. और इसी क्रम में अपनी आलसी बहू को कोसते रहना भी नियम से होता था.काल चक्र पर धीरे धीरे समय खिसकता जा रहा था.बच्चे बड़े हो चले थे,बड़े बूढे,और बूढे ......बूढे क्या हुए ये शायद आज तक कोई नही जान पाया. शायद जीवन के दृश्य पटल पर भागते भागते वो छितिज के पार चले गए थे. और छितिज के पार जाने वालों में एक दिन पंडित नाना का भी नाम लिख दिया गया था. वो विशाल भीमकाय काया फूलो से ढकी जमीन पर रखी हुई थी और मैं आज भी रोती बिलखती नानी की आँखों में आते जाते भावों को देख रहा था.अपनी एक कड़कती आवाज से सम्पूर्ण घर पर हुकूमत कायम कर लेने वाली नानी पर नाना को छितिज से वापस बुला सकने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी थी.
अपनी छत पर खेलते हुए जब हमारी गेंद उनकी छत पर चली जाती और हम भाग कर उठाने दौड़ते तो हमारे क़दमों की आहट सुनकर वो भी छत पर चली आतीं और शुरू होता उन आँखों का रौद्र रूप -"नासकाटों ! इतनी बड़ी छत कम पड़ रही है तुम सबको उधम मचाने के लिए. जो इधर कूद कर चले आए. हम कहे दे रहे बबलू की मम्मी !हमका ऐ सब बिल्कुल पसंद नही है.अबकी ई सब इधर आए तो ठीक नही होगा.
उनकी कर्कश वाणी और जलती आंखों के बाद शुरू होता माँ का रौद्र रूप. पुराने मकान की छत कमजोर होने का भय इस तरह उनके सीने में बसा था की बस क़दमों की आहट से ही उन्हें लगने लगता था कि कोई उनके सीने पर चल रहा है. और इसी क्रम में जब कभी नाना पंडिताई करके फल लाते तो अपनी बहू से बचा कर चुपचाप हम लोगो को पकड़ा देती थीं. तब नजर आता था मुझे उन आँखों में वो दूसरा रूप ममत्व का. ले ! ले जा !चुप्पे खा लेना .इस शब्दों को सुनने के बजाय मैं उन आँखों के भावों को पढ़ा करता था. परिवार के शेष सदस्यों पर उन्ही की हुकूमत चलती थी. सुबह चार बजे उठने के साथ ही उनकी हुकूमत शुरू हो जाती थी.पानी भरना, पूजा करना ,झाडू बुहारू करना ये सब उनकी दिनचर्या का अंग था. और इसी क्रम में अपनी आलसी बहू को कोसते रहना भी नियम से होता था.काल चक्र पर धीरे धीरे समय खिसकता जा रहा था.बच्चे बड़े हो चले थे,बड़े बूढे,और बूढे ......बूढे क्या हुए ये शायद आज तक कोई नही जान पाया. शायद जीवन के दृश्य पटल पर भागते भागते वो छितिज के पार चले गए थे. और छितिज के पार जाने वालों में एक दिन पंडित नाना का भी नाम लिख दिया गया था. वो विशाल भीमकाय काया फूलो से ढकी जमीन पर रखी हुई थी और मैं आज भी रोती बिलखती नानी की आँखों में आते जाते भावों को देख रहा था.अपनी एक कड़कती आवाज से सम्पूर्ण घर पर हुकूमत कायम कर लेने वाली नानी पर नाना को छितिज से वापस बुला सकने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी थी.
रविवार, 25 जनवरी 2009
मेरे बाऊ जी
सन्नाटे और तन्हाईयों की कई दीवारे गिराने के बाद न जाने कैसे आज मैं यादों के उस कमरे में पहुँच गया जो मेरे बाऊ जी मुझे किसी अमानत की तरह सौप कर किसी अनजान सफर पर चल दिए.हसरतों ख्वाहिशों और न जाने कितनी रूमानी तम्मनाओं से भरा हुआ था ये कमरा जो बाऊ जी अपने से बचपन से सहेज कर यहाँ तक लाये थे. या फ़िर विरासत में शायद मेरे बाऊ जी को उनके बाऊ जी ने दिया होगा. तमन्नाओं के कई बक्से उन्होंने खोलो और दिखलाये और कई अनछुए छोड़ कर ही चले गए. तम्मंनाये कुछ ऐसी थी जिनमे ख़ुद कुछ कर दिखने का जोश और कुछ ऐसी थी जिनमे अपने चाहने वालों के कहीं पहुँच जाने का जज्बा भरा हुआ था. अक्सर शाम के धुंधलके में किसी तिलिस्म की भांति खुलती हुई उनके बचपन की बातें मुझे रोमांचित कर दिया करती थी. जिंदगी भर किसी मुसाफिर की भांति हजारों दिलों की हसरतों को पूरा करने के लिए कई तमन्नाओं का बोझ उठाये चलने वाले मेरे बाऊ जी थोड़ा सा छेड़ते ही अपने किस्से कहानियो में खो जाते थे. शाम को हमारे घर के सामने बने पार्क और घर के बीच की बाई पास रोड पर अक्सर हम दोनों कुर्सी डाल कर बैठ जाते थे. एक चाय के प्याले के साथ वो पचासों साल पीछे के सफर पर निकला जाया करते थे.........
शनिवार, 17 जनवरी 2009
वस्ल और हिज्र कि बातें चलो बेमानी कर दें,
मिलें कुछ यूं कि बिछड़ने को शर्म से पानी पानी कर दें।
चाँद सितारों से सजी एक रात तेरे पहलू में चली आई है,
तेरे पहलू में हम भी सिमट के इस रात को रूमानी कर दें।
मेरी मोहब्बत का इश्तहार तेरे चेहरे पे नज़र आता है,
आ किसी दिन मिल के इसे सबकी ज़ुबानी कर दे।
कल शाम फिर एक दर्द नें दस्तक मारी ,
हमने तो समझा था कि आज मौत कि बारी है।
पर मौत पाना जिंदगी जितना आसान नहीं ए मासूम !
मौत का अपना एक रुतबा है जिंदगी तो बेचारी है।
मिलें कुछ यूं कि बिछड़ने को शर्म से पानी पानी कर दें।
चाँद सितारों से सजी एक रात तेरे पहलू में चली आई है,
तेरे पहलू में हम भी सिमट के इस रात को रूमानी कर दें।
मेरी मोहब्बत का इश्तहार तेरे चेहरे पे नज़र आता है,
आ किसी दिन मिल के इसे सबकी ज़ुबानी कर दे।
कल शाम फिर एक दर्द नें दस्तक मारी ,
हमने तो समझा था कि आज मौत कि बारी है।
पर मौत पाना जिंदगी जितना आसान नहीं ए मासूम !
मौत का अपना एक रुतबा है जिंदगी तो बेचारी है।
गुरुवार, 24 जुलाई 2008
प्रकाश और विचार
प्रकाश की एक की किरण सूरज से चलती है इस सृष्टि की किसी चीज पर गिरती है और परावर्तित होकर हमारी आंखों तक आती है आँखें दिमाग को संदेश भेजती हैं और दिमाग अपने अनुभव के आधार पर उस चीज को पहचान लेता है।
एक विचार परम ब्रह्म से चलता है किसी पदार्थ पर गिरता है परावर्तित होकर हमारे मस्तिष्क तक आता है दिमाग उस विचार को विश्लेषित करता है और अपने अनुभवों के आधार पर हमें कोई काम करने की प्रेरणा देता है।
दो एक जैसी घटनाएं एक को हम मान लेते है क्योंकि वैज्ञानिकों ने इसे प्रयोग द्वारा सिद्ध कर दिया । दूसरे को हम नही मानते क्योंकि वैज्ञानिकों ने इस दिशा में कभी काम ही नही किया । पहली घटना के रास्ते में बहुत सी भौतिक चीजें पड़ती हैं जिसका भौतिक सत्यापन एवं विश्लेषण किया जा सकता है। और वैज्ञानिकों को अपनी उपलब्धि गिनवाने के लिए भौतिक विश्लेषण आसान जान पड़ता है. आप आंख देख सकते है आप चीजों को देख सकते हैं। किंतु दूसरी घटना के रास्ते में कुछ भी भौतिक नही है और जो भौतिक है यानी दिमाग वो इंतना जटिल है कि वैज्ञानिकों ने आज तक उस से तौबा कर रखी है। और उससे किनारा काटते आयें हैं। इस दिशा में हमारे ऋषि मुनियों ने काफ़ी शोध किया था। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दो अलग अलग विचार धाराएँ हैं वैज्ञानिक विचार धारा में अपने आँख नाक कान हमेशा खुले रखने पड़ते हैं और निरंतर इस माया रुपी संसार को निरखते परखते रहना पड़ता है। जबकि आध्यात्मिक मार्ग में अपने आँख नाक कान हमेशा बंद रखने पड़ते हैं और इस माया रुपी संसार से हमेशा दूर रहना पड़ता है। दो विचार धाराएँ हैं, मार्ग अलग अलग हैं, इसी लिए दोनों एक दूसरे को दोषी ठहराते रहते हैं किंतु ये निश्चित है कि सत्य सत्य ही रहेगा । जिस दिन भी वो उजागर होगा वो एक ही रहेगा भले ही हम किसी भी मार्ग को क्यों न अपनाएँ ।
हम पुनः अपने प्रयोग कि ओर चले।
विचार और प्रकाश का तुलनात्मक अध्ययन-
शायद हम में से किसी ने भी प्रकाश को नही देखा है , जी हाँ हम प्रकाश को नही देखते बल्कि प्रकाश से प्रकाशित होने वाली वस्तुओं को देखते है। और तब प्रकाश का अस्तित्व आसानी से मान लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आपकी पाँच इन्द्रियां सिर्फ़ उस सतरंगी प्रकाश को देखने में ही समर्थ हैं। लेकिन जनाब दुनिया आपकी पाँच इन्द्रियों से पहले भी है और बाद में भी है। आपके बगल में बैठा कुत्ता दूर से आती अलटावायलेट तरंगों को सुन लेता है। और आप बहरे व्यक्तियों कि भांति बैठे रहते हैं । आप कुत्ते से ज्यादा समर्थ हैं किंतु सिर्फ़ पाँच इन्द्रियों तक सीमित हैं। एक और आश्चर्य जनक सत्य मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ये रंगीन दुनिया आप रंगीन प्रकाश में देखते हैं किंतु जानवरों के लिए ये दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट है। जी हाँ जानवरों के पास रंगों के प्रति सवेदनशीलता नही होती है। मेरा कहने का मतलब ये है कि दुनिया सिर्फ़ वही नही है जो कि आप द्वेखते हैं। किसी गाय कि दुनिया अलग होगी किसी मेढक कि दुनिया अलग होगी।
जिस प्रकार प्रकाश कि प्रतिक्रिया के लिए आंखों का होना आवश्यक है उसी प्रकार विचार कि प्रतिक्रिया के लिए दिमाग का होना आवश्यक है। इस दुनिया में सबसे तेज प्रकाश कि गति होती है और उससे तेज विचार कि गति होती है। जब आप किसी वस्तु को देखते हैं तो इस देखने कि प्रक्रिया में ऐसा नही कि आपकी आंखों से कोई प्रकाश निकल रहा होता है या फ़िर वो वस्तु ख़ुद अपने को प्रकाशित कर रही होती है। बल्कि कहीं और से प्रकाश आकर उस पर गिरता है जिसका परावर्तन और विश्लेषण आपके मस्तिष्क में होता तब आप दुनिया देखते हैं। ठीक इसी प्रकार विचार न तो आपका मस्तिष्क उत्पन्न करता है न वो वस्तु उत्पन्न करती है जिसे आप देख रहे होते हैं। बल्कि विचार kahiin और से आकर उस वस्तु पर गिरता है और उसका परावर्तन और विश्लेषण आपके मस्तिष्क में होता है और तब दुनिया चलती है। किसी लड़की को देख कर उस पर मोहित हो उठना आपकी बहादुरी नही है बल्कि एक विचार उस लड़की पर गिरता है और वो परावर्तित होकर आपके मस्तिष्क में आता है जिसका विश्लेषण आपका दिमाग करके प्रतिक्रिया उत्पन्न कर देता है।सारे कर्म आपके विचार पर आधारित हैं और आपके विचारों पर आपका कोई नियंत्रण नही है।ये कहीं और से आ रहे हैं.और ये पूर्व निर्धारित है. आपका दिमाग सिर्फ़ इन्हे विश्लेषित कर रहा है और आपका अहंकार आपको ये जताता है कि ये सब आप कर रहे हैं। एक टी.वी सिर्फ़ अपने चैनल को दिखा सकता है उसके सिगनाल को बदल नही सकता .क्योंकि वो पूर्व निर्धारित हैं. अब अगर टी. वी. में अहंकार भर दे तो वो सोचेगा कि ये चैनल तो मैं दिखा रहा हूँ जबकि वो सिर्फ़ दूर से आने वाले सिग्नलों को रूपांतरित कर रहा होता है. इसी प्रकार तुलनात्मक अध्ययन मेंआपको एक और उदाहरण देना चाहूँगा कि जब आप किसी माध्यम के द्वारा सारे रंगों को रोक देते है और सिर्फ़ एक रंग के प्रकाश को अन्दर बाहर आने जाने देते है तो तो दुनिया आपको वैसी ही नजर आती है या यूँ कहें की उसी रंग की नजर आती है। मान ले आप किसी लाल रंग के कांच वाले बंद कमरे में बैठ जाते हैं तो दुनिया आपको लाल रंग की नजर आती है। और बाहरी दुनिया ले लोग भी आपको लाल रंग का समझते हैं। ठीक इसी प्रकार जब आप आध्यात्मिक होकर किसी विचार की परत अपने चारो ओर लगा लेते हैं तो आप वैसे ही बन जाते हैं । गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक उपलब्धि ऐसे ही एक विचार की परिणित थी जिस विचार ने उन्हें आजीवन घेरे रखा । उन्होंने शान्ति के विचार की परत अपने चारों ओर लगा ली थी । जिससे बाकी सारे विचार परावर्तित हो जाते थे और उन तक केवल शान्ति के विचार ही पहुच पाते थे। और वे लोगो तक केवल शान्ति के विचार ही पहुँचा पाते थे। ठीक उसी प्रयोग की तरह जो लाल कांच के कमरे पर आधारित था। सृष्टि के आरम्भ में ऊर्जा का रूपांतरण कई भागों में हुआ गतिज उर्जा ,सिथितिज उर्जा ,प्रकाश उर्जा , और उन्ही में एक है विचार ऊर्जा। विचार उर्जा को भी प्रकाश उर्जा की भांति गति के लिए माध्यम की आवश्यकता नही होती । आप सब ने सुना और देखा कि सूरज धरती का जीवन दाता है। जिस क्षण सूरज नही रहेगा दुनिया नष्ट हो जायेगी । अब यदि कल्पना कीजिये कि जिस क्षण दुनिया के सारे लोग विचार शून्य हो जायेंगे उस क्षण भी दुनिया रूक जायेगी या यूँ कहें कि नष्ट हो जायेगी । विचार ऊर्जा जीवन के लिए ज्यादा आवश्यक है। विचार उर्जा के से हमने हवाई जहाज और रॉकेट बना लिए , किसी दिन इसी विचार ऊर्जा से हम ये धरती छोड़ किसी दूसरे ग्रह पर भी जा सकते हैं.या फ़िर जीवन ऊर्जा के लिए प्रकाश के बजाये कोई और माध्यम दूंढ ले , किंतु विचार ऊर्जा के बिना ये सब असंभव है किंतु प्रश्न फ़िर वही उठता है कि ये विचार आते कहाँ से हैं?..............
एक विचार परम ब्रह्म से चलता है किसी पदार्थ पर गिरता है परावर्तित होकर हमारे मस्तिष्क तक आता है दिमाग उस विचार को विश्लेषित करता है और अपने अनुभवों के आधार पर हमें कोई काम करने की प्रेरणा देता है।
दो एक जैसी घटनाएं एक को हम मान लेते है क्योंकि वैज्ञानिकों ने इसे प्रयोग द्वारा सिद्ध कर दिया । दूसरे को हम नही मानते क्योंकि वैज्ञानिकों ने इस दिशा में कभी काम ही नही किया । पहली घटना के रास्ते में बहुत सी भौतिक चीजें पड़ती हैं जिसका भौतिक सत्यापन एवं विश्लेषण किया जा सकता है। और वैज्ञानिकों को अपनी उपलब्धि गिनवाने के लिए भौतिक विश्लेषण आसान जान पड़ता है. आप आंख देख सकते है आप चीजों को देख सकते हैं। किंतु दूसरी घटना के रास्ते में कुछ भी भौतिक नही है और जो भौतिक है यानी दिमाग वो इंतना जटिल है कि वैज्ञानिकों ने आज तक उस से तौबा कर रखी है। और उससे किनारा काटते आयें हैं। इस दिशा में हमारे ऋषि मुनियों ने काफ़ी शोध किया था। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दो अलग अलग विचार धाराएँ हैं वैज्ञानिक विचार धारा में अपने आँख नाक कान हमेशा खुले रखने पड़ते हैं और निरंतर इस माया रुपी संसार को निरखते परखते रहना पड़ता है। जबकि आध्यात्मिक मार्ग में अपने आँख नाक कान हमेशा बंद रखने पड़ते हैं और इस माया रुपी संसार से हमेशा दूर रहना पड़ता है। दो विचार धाराएँ हैं, मार्ग अलग अलग हैं, इसी लिए दोनों एक दूसरे को दोषी ठहराते रहते हैं किंतु ये निश्चित है कि सत्य सत्य ही रहेगा । जिस दिन भी वो उजागर होगा वो एक ही रहेगा भले ही हम किसी भी मार्ग को क्यों न अपनाएँ ।
हम पुनः अपने प्रयोग कि ओर चले।
विचार और प्रकाश का तुलनात्मक अध्ययन-
शायद हम में से किसी ने भी प्रकाश को नही देखा है , जी हाँ हम प्रकाश को नही देखते बल्कि प्रकाश से प्रकाशित होने वाली वस्तुओं को देखते है। और तब प्रकाश का अस्तित्व आसानी से मान लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आपकी पाँच इन्द्रियां सिर्फ़ उस सतरंगी प्रकाश को देखने में ही समर्थ हैं। लेकिन जनाब दुनिया आपकी पाँच इन्द्रियों से पहले भी है और बाद में भी है। आपके बगल में बैठा कुत्ता दूर से आती अलटावायलेट तरंगों को सुन लेता है। और आप बहरे व्यक्तियों कि भांति बैठे रहते हैं । आप कुत्ते से ज्यादा समर्थ हैं किंतु सिर्फ़ पाँच इन्द्रियों तक सीमित हैं। एक और आश्चर्य जनक सत्य मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ये रंगीन दुनिया आप रंगीन प्रकाश में देखते हैं किंतु जानवरों के लिए ये दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट है। जी हाँ जानवरों के पास रंगों के प्रति सवेदनशीलता नही होती है। मेरा कहने का मतलब ये है कि दुनिया सिर्फ़ वही नही है जो कि आप द्वेखते हैं। किसी गाय कि दुनिया अलग होगी किसी मेढक कि दुनिया अलग होगी।
जिस प्रकार प्रकाश कि प्रतिक्रिया के लिए आंखों का होना आवश्यक है उसी प्रकार विचार कि प्रतिक्रिया के लिए दिमाग का होना आवश्यक है। इस दुनिया में सबसे तेज प्रकाश कि गति होती है और उससे तेज विचार कि गति होती है। जब आप किसी वस्तु को देखते हैं तो इस देखने कि प्रक्रिया में ऐसा नही कि आपकी आंखों से कोई प्रकाश निकल रहा होता है या फ़िर वो वस्तु ख़ुद अपने को प्रकाशित कर रही होती है। बल्कि कहीं और से प्रकाश आकर उस पर गिरता है जिसका परावर्तन और विश्लेषण आपके मस्तिष्क में होता तब आप दुनिया देखते हैं। ठीक इसी प्रकार विचार न तो आपका मस्तिष्क उत्पन्न करता है न वो वस्तु उत्पन्न करती है जिसे आप देख रहे होते हैं। बल्कि विचार kahiin और से आकर उस वस्तु पर गिरता है और उसका परावर्तन और विश्लेषण आपके मस्तिष्क में होता है और तब दुनिया चलती है। किसी लड़की को देख कर उस पर मोहित हो उठना आपकी बहादुरी नही है बल्कि एक विचार उस लड़की पर गिरता है और वो परावर्तित होकर आपके मस्तिष्क में आता है जिसका विश्लेषण आपका दिमाग करके प्रतिक्रिया उत्पन्न कर देता है।सारे कर्म आपके विचार पर आधारित हैं और आपके विचारों पर आपका कोई नियंत्रण नही है।ये कहीं और से आ रहे हैं.और ये पूर्व निर्धारित है. आपका दिमाग सिर्फ़ इन्हे विश्लेषित कर रहा है और आपका अहंकार आपको ये जताता है कि ये सब आप कर रहे हैं। एक टी.वी सिर्फ़ अपने चैनल को दिखा सकता है उसके सिगनाल को बदल नही सकता .क्योंकि वो पूर्व निर्धारित हैं. अब अगर टी. वी. में अहंकार भर दे तो वो सोचेगा कि ये चैनल तो मैं दिखा रहा हूँ जबकि वो सिर्फ़ दूर से आने वाले सिग्नलों को रूपांतरित कर रहा होता है. इसी प्रकार तुलनात्मक अध्ययन मेंआपको एक और उदाहरण देना चाहूँगा कि जब आप किसी माध्यम के द्वारा सारे रंगों को रोक देते है और सिर्फ़ एक रंग के प्रकाश को अन्दर बाहर आने जाने देते है तो तो दुनिया आपको वैसी ही नजर आती है या यूँ कहें की उसी रंग की नजर आती है। मान ले आप किसी लाल रंग के कांच वाले बंद कमरे में बैठ जाते हैं तो दुनिया आपको लाल रंग की नजर आती है। और बाहरी दुनिया ले लोग भी आपको लाल रंग का समझते हैं। ठीक इसी प्रकार जब आप आध्यात्मिक होकर किसी विचार की परत अपने चारो ओर लगा लेते हैं तो आप वैसे ही बन जाते हैं । गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक उपलब्धि ऐसे ही एक विचार की परिणित थी जिस विचार ने उन्हें आजीवन घेरे रखा । उन्होंने शान्ति के विचार की परत अपने चारों ओर लगा ली थी । जिससे बाकी सारे विचार परावर्तित हो जाते थे और उन तक केवल शान्ति के विचार ही पहुच पाते थे। और वे लोगो तक केवल शान्ति के विचार ही पहुँचा पाते थे। ठीक उसी प्रयोग की तरह जो लाल कांच के कमरे पर आधारित था। सृष्टि के आरम्भ में ऊर्जा का रूपांतरण कई भागों में हुआ गतिज उर्जा ,सिथितिज उर्जा ,प्रकाश उर्जा , और उन्ही में एक है विचार ऊर्जा। विचार उर्जा को भी प्रकाश उर्जा की भांति गति के लिए माध्यम की आवश्यकता नही होती । आप सब ने सुना और देखा कि सूरज धरती का जीवन दाता है। जिस क्षण सूरज नही रहेगा दुनिया नष्ट हो जायेगी । अब यदि कल्पना कीजिये कि जिस क्षण दुनिया के सारे लोग विचार शून्य हो जायेंगे उस क्षण भी दुनिया रूक जायेगी या यूँ कहें कि नष्ट हो जायेगी । विचार ऊर्जा जीवन के लिए ज्यादा आवश्यक है। विचार उर्जा के से हमने हवाई जहाज और रॉकेट बना लिए , किसी दिन इसी विचार ऊर्जा से हम ये धरती छोड़ किसी दूसरे ग्रह पर भी जा सकते हैं.या फ़िर जीवन ऊर्जा के लिए प्रकाश के बजाये कोई और माध्यम दूंढ ले , किंतु विचार ऊर्जा के बिना ये सब असंभव है किंतु प्रश्न फ़िर वही उठता है कि ये विचार आते कहाँ से हैं?..............
मंगलवार, 8 जुलाई 2008
चयन की स्वतंत्रता
आप भले ही न माने की हम सब आपस में इंटर कनेक्टेड हैं लेकिन विज्ञानं ये मान चुका है। जी हाँ । ये हम सब जानते हैं की प्रत्येक अणू के मूलभूत परमाणु आपस में जोड़े में होते हैं। जो आपस में एक दूसरे के विपरीत अपने अक्ष गति कर रहे होते हैं यानि यदि एक +१/२ दिशा में गति कर रहा है तो दूसरा -१/२ दिशा में गति कर रहा होगा। अब वैज्ञानिको ने उपकरणों की मदद से उन दोनों को अलग अलग कर दिया और उन दोनों को लाखों किलो मीटर दूर कर दिया फ़िर किस प्रकार से उन्होंने एक मूलभूत परमाणु की गति बदल दी यानि जो +१/२ दिशा में गति कर रहा था उसको -१/२ दिशा में गति करवानी शुरू कर दी। उन्होंने एक चमत्कारिक परिणाम देखा की दूसरे मूलभूत परमाणु ने जो उनके कक्ष से काफ़ी दूर था उसने स्वत अपने अक्ष पर अपनी गति बदल दी। ये अभी ज्ञात नही हो पाया है की इतनी दूर उस दूसरे परमाणु को कैसे पता चला की मेरे जोडीदार ने अपनी गति की दिशा बदल दी है। जब इतने मूलभूत परमाणु आपस में संवाद रखते है तो उनसे बनी दुनिया भी निश्चित ही आपस में संवाद रखती होगी। क्यों आपको अचानक कोई चीज अच्छी लगने लगती है, क्यों किसी से अचानक प्यार हो जाता। मेरे विचार से ना केवल हम सब आपस में सम्बन्ध रखते हैं, बल्कि कोई बाहरी शक्ति भी है जो हमे आपस में जोड़े रखती है। मेरा कुंडली की विधा में काफी रूचि है । इस विधा के अध्यन में मैंने ये पाया की कुण्डलियाँ निश्चित ही होती है और प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य पूर्व निर्धारित होता है। अब प्रशन ये उठता है की यदि सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या औचित्य है। मेरे विचार से ये सिर्फ़ अहंकार को संतुष्ट करने का तरीका है। ताकि दुनिया संचालित होती रहे और आपको ये न लगे की सब कुछ यदि निश्चित है तो कर्म क्यों किया जाए .अगर आप कर्म नही करेंगे तो निशचय ही दुनिया रुक जायेगी.इसीलिए आप के मष्तिष्क में अहंकार भर दिया गया की आपको ये लगे की आप इस दुनिया को संचालित कर रहे हैं. ये सिर्फ़ प्रतीति मात्र है की ये चीजें मेरे करने से हो रही है। आपके इस बियोलोजिकल शरीर में आपका दिमाग सिर्फ़ आपका विचार ऊर्जा को पदार्थ उर्जा में परिवर्तित करने का एक मात्र साधन है इस सृष्टि में फैले विचारों को वो पढता है और उन्हें नए अविष्कारों के मध्यम से पदार्थ में परिवर्तित कर देता है। इतिहास गवाह है की नयी नयी खोजें सिर्फ़ एक विचार से हुई हैं। ये विचार ही हैं जो किसी को हिटलर और किसी को गाँधी बनते हैं, जबकि सभी जीव विज्ञानं की दृष्टि से बराबर हाथ पैर और आंख नाक मुह वाले थे। अन्तर था तो सिर्फ़ उनके विचारों का। इसी क्रम में आगे बढ़ने पर ये प्रश्न उठा है की क्या आप किसी विचार के द्बारा कोई निर्णय लेने में समर्थ हैं। क्या आपको चयन की स्वतंत्रता है... मेरा मतलब की यदि आप I.A.S. बनने का निर्णय लेते हैं तो क्या आप I.A.S. बन सकते हैं मेरा जवाब है नही। यदि आप के कुंडली में I.A.S. बनना नही लिखा है तो आप कभी I.A.S. नही बन सकते क्योंकि आपके विचार कभी ऐसे बन ही नही पायेंगे। कभी आप को
सांसारिक चीजें परेशान करेंगी तो कभी आप का ध्यान कही और चला जाएगा और आप लाख प्रयत्नों के बाद भी अपने चयन को पाने के लिए स्वतंत्र नही होंगे। लेकिन जब आपकी कुंडली में I.A.S.बनना लिखा होगा तो आप अचानक निर्णय ले लेंगे और सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने निर्णय को पा लेंगे। क्योंकि आपका दिमाग उस समय सिर्फ़ और सिर्फ़ I.A.S. से सम्बंधित विचारों को ही ग्रहण करेगा। आपका संपूर्ण व्यक्तित्व आपके विचारों से ही बनता है। आज तक शायद ही किसी बाप ने अपने बेटे से कहा होगा की बेटा तुम बड़े होकर चोर या डाकू बनना हर माता पिता अपने बच्चे को बहुत होनहार बनाना चाहता है फ़िर भी इस दुनिया में चोर डाकू हैं .जब किसी व्यक्ति ने चोर या डाकू बन ने का निर्णय नही लिया तो फ़िर ये लोग आए कहाँ से। ये हमारे चयन की स्वतन्त्रता नही है, चोर बनने का निर्णय हमारा नही था जो सिद्ध करता है की कुछ चीजें इस दुनिया में हमारे निर्णय के विपरीत भी आती हैं। हर एक व्यक्ति का भविष्य और जीवन पथ निर्धारित है और वो उसी के अनुसार निर्णय लेता है। और फ़िर अपनी नियति को पहुँच जाता है। यदि आप अपनी नियति से संघर्ष करेंगे तो जीवन भर परेशान रहेंगे और यदि उसे स्वीकार कर लेंगे तो आजीवन सुखी रहेंगे। किंतु ये अहंकार हमें निरंतर संघर्ष कराता रहता है और हम अपनी नियति से इतर बन्ने की चेष्टा करते रहते हैं उसे स्वीकार नही करते यही हमारे दुखों का कारण हैं। नीम का पेड़ आजीवन नीम ही रहेगा ,वो लाख चेष्टा कर ले। सूरज चाँद सब किसी न किसी अनुशाषान से बंधे हैं । आप अपने जीवन को बिल्कुल भी बदल नही सकते हाँ इसके काल चक्र का आनद उठा सकते हैं।और आप निश्चित ही माने की इस दुनिया को आपकी भी बहुत जरुरत है अगर आप न होते तो ये दुनिया अधूरी होती। ये विचार मैं आप तक क्यों पहुँचा रहा हूँ मुझे ख़ुद नही मालूम लेकिन ये जरूर है की सृष्टि के इस प्रोसेस में मैं अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी के साथ निभा रहा हूँ। तो आप भी जिंदगी का मजा उठाइए और इस सृष्टि में अपनी भूमिका पुरी ईमानदारी से निभाइए। ।
सांसारिक चीजें परेशान करेंगी तो कभी आप का ध्यान कही और चला जाएगा और आप लाख प्रयत्नों के बाद भी अपने चयन को पाने के लिए स्वतंत्र नही होंगे। लेकिन जब आपकी कुंडली में I.A.S.बनना लिखा होगा तो आप अचानक निर्णय ले लेंगे और सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने निर्णय को पा लेंगे। क्योंकि आपका दिमाग उस समय सिर्फ़ और सिर्फ़ I.A.S. से सम्बंधित विचारों को ही ग्रहण करेगा। आपका संपूर्ण व्यक्तित्व आपके विचारों से ही बनता है। आज तक शायद ही किसी बाप ने अपने बेटे से कहा होगा की बेटा तुम बड़े होकर चोर या डाकू बनना हर माता पिता अपने बच्चे को बहुत होनहार बनाना चाहता है फ़िर भी इस दुनिया में चोर डाकू हैं .जब किसी व्यक्ति ने चोर या डाकू बन ने का निर्णय नही लिया तो फ़िर ये लोग आए कहाँ से। ये हमारे चयन की स्वतन्त्रता नही है, चोर बनने का निर्णय हमारा नही था जो सिद्ध करता है की कुछ चीजें इस दुनिया में हमारे निर्णय के विपरीत भी आती हैं। हर एक व्यक्ति का भविष्य और जीवन पथ निर्धारित है और वो उसी के अनुसार निर्णय लेता है। और फ़िर अपनी नियति को पहुँच जाता है। यदि आप अपनी नियति से संघर्ष करेंगे तो जीवन भर परेशान रहेंगे और यदि उसे स्वीकार कर लेंगे तो आजीवन सुखी रहेंगे। किंतु ये अहंकार हमें निरंतर संघर्ष कराता रहता है और हम अपनी नियति से इतर बन्ने की चेष्टा करते रहते हैं उसे स्वीकार नही करते यही हमारे दुखों का कारण हैं। नीम का पेड़ आजीवन नीम ही रहेगा ,वो लाख चेष्टा कर ले। सूरज चाँद सब किसी न किसी अनुशाषान से बंधे हैं । आप अपने जीवन को बिल्कुल भी बदल नही सकते हाँ इसके काल चक्र का आनद उठा सकते हैं।और आप निश्चित ही माने की इस दुनिया को आपकी भी बहुत जरुरत है अगर आप न होते तो ये दुनिया अधूरी होती। ये विचार मैं आप तक क्यों पहुँचा रहा हूँ मुझे ख़ुद नही मालूम लेकिन ये जरूर है की सृष्टि के इस प्रोसेस में मैं अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी के साथ निभा रहा हूँ। तो आप भी जिंदगी का मजा उठाइए और इस सृष्टि में अपनी भूमिका पुरी ईमानदारी से निभाइए। ।
सोमवार, 30 जून 2008
शरीर के प्रकार
शरीर तीन प्रकार का होता है। सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर , मायावी शरीर। आपने सूक्ष्म शरीर के बारे में सुना होगा। सूक्ष्म शरीर यानी आत्मा इसकी गहराईयों में जाने में इसके कई प्रकार और मिलते हैं। मन,प्राण,चेतना इत्यादि इसमे शामिल होते हैं। कारण शरीर जिसमें आपके हाथ पैर नाक कान इत्यादि आतें हैं। जिसके अस्वथय होने पर आपको डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती है। एक स्वस्थ जीवन शैली अपना कर आप इसको स्वस्थ रख सकते हैं।तीसरा प्रकार होता है मायावी शरीर का। मायावी शरीर वो होता है जिस रूप में आपको दुनिया देखती है। आपकी वाह्य अवस्था। आपका पद,आपका रूप रंग इत्यादि .ये सब चीजें आपके मायावी शरीर के अंतर्गत आती हैं। आप किसी के पिता हो सकते हैं आप किसी के पति हो सकते हैं,ऐसे हजारों रूप आपके होते हैं । हर रूप के व्यक्ति के लिए आपकी अलग अलग छवि हो सकती है। व्यक्ति अपनी मूल भूत छवियों से अलग हटकर जीवन भर अपनी मायावी छवि को संतुष्ट करने में लगा रहता है। और यही मुख्या वजह है किसी भी व्यक्ति के परेशान होने की। आप कभी इस बात का जश्न नही मानते की आपने आज एक दिन और स्वस्थ गुजारा। आप अपनी नयी गाड़ी का जश्न मनाते हैं, आप आपने प्रमोशन का जश्न मनाते हैं।आपके लिए पद प्रतिष्ठा धन इत्यादि चीजों का अत्यधिक महत्त्व होता है। और इन चीजों के चले जाने पर आप उतना ही दुखी होतें है। पर निश्चय ही ये चीजें सिर्फ़ आपके मायावी शरीर को सुख पहुँचा सकतीं हैं। आपके सारे सुखों की उत्पात्ति क्रमश इन्ही शरीरों के स्वस्थ होने पर होती है। मायावी शरीर के सुख आपको छनिक सुख देंगे और जीवन भर आप इनके पीछे भागते रहेंगे। कारण शरीर आपको सिर्फ़ इसी जीवन का सुख देगा। जबकि सूचम शरीर आपको कभी न ख़त्म होने वाला आनंद देता है। इस सारे सुखों की मह्ह्त्ता उल्टे क्रम में शुरू होती है। अर्थात यदि आप का सुक्छ्म शरीर बीमार है तो आगे के सारे सुख, कारण शरीर के सुख और मायावी शरीर के सुख आपके लिए बेकार है। यदि कारण शरीर बेकार है तो सारे मायावी सुख बेकार है। इसको थोड़ा और विस्तृत करके बतातें है की यदि आपको तीव्र ज्वर है तो आप को स्वादिष्ट भोजन अच्छा नही लगेगा,आपको बड़े बड़े महल नही अच्छे लगेंगे। क्योंकि कारण शरीर दुखी है। ठीक इसी प्रकार जब आपकी अंतरात्मा दुखी होती है तो आपको ये जीवन अच्छा नही लगता है। अब इसी बात को उल्टे तरीके से कहें तो यही से सुखों का मार्ग मिलने लगता है......आप सर्वप्रथम अपने मन को खुश करें फ़िर शरीर को मायावी सुख तो अपने आप मिल जायेंगें। रेगिस्तान में जल का आभास होने पर हिरन किस प्रकार उसके पीछे व्याकुल हो कर भागता है। और फ़िर थक कर अपनी जान दे देता है। यदि उसे मृगतृष्णा का ज्ञान होता तो शायद इतना व्यथित होकर न मरता। जब भी आपको माया का ज्ञान हो जाए उसके पीछे भागिए जरूर लेकिन उसकी सच्चायी को जानते हुए। की इतनी मेहनत से पायी हुई मायावी चीजें चानिक सुख ही दे सकती हैं। जीवन अनमोल है और हर चन बदल रहा है किसी भी परेशानी के चन में आप महसूस कीजिये की आप एक स्वस्थ शरीर के मालिक हैं। और उस शरीर के खो जाने पर भी आप एक स्वस्थ आत्मा के मालिक हैं। अकबर सिकंदर से आप से ज्यादा दौड़ लगायी थी जिंदगी को पाने के लिए मगर अंत में वही एक आत्मा ले कर गए जो वो लेकर आए थे। खुशियाँ बिखरी पड़ी हैं जरूरत है महसूस करने की। अपने सबसे परेशानी के पल में आप किसी पेड़ भरे बाग़ में खड़े हो कर देखिये और उन्ही पलों में एक मर्सिडीज के बगल में खड़े हो के देखिये॥ कहाँ आपको सुकून मिलेगा निशचाई ही बाग़ में....कारण है उसका पेड़ में जीवन है पानी में जीवन है हवा में जीवन है, और जीवन ही जीवन का कष्ट समझ सकता है। ये नोटों के ,ये गाडियां ये ,बंगले कभी आपके कष्ट को नही समझ सकते और जो आपके कष्ट को समझ नही सकता वो आपको खुशी कैसे पहुँचा रहा है।
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