सोमवार, 30 जून 2008
शरीर के प्रकार
शरीर तीन प्रकार का होता है। सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर , मायावी शरीर। आपने सूक्ष्म शरीर के बारे में सुना होगा। सूक्ष्म शरीर यानी आत्मा इसकी गहराईयों में जाने में इसके कई प्रकार और मिलते हैं। मन,प्राण,चेतना इत्यादि इसमे शामिल होते हैं। कारण शरीर जिसमें आपके हाथ पैर नाक कान इत्यादि आतें हैं। जिसके अस्वथय होने पर आपको डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती है। एक स्वस्थ जीवन शैली अपना कर आप इसको स्वस्थ रख सकते हैं।तीसरा प्रकार होता है मायावी शरीर का। मायावी शरीर वो होता है जिस रूप में आपको दुनिया देखती है। आपकी वाह्य अवस्था। आपका पद,आपका रूप रंग इत्यादि .ये सब चीजें आपके मायावी शरीर के अंतर्गत आती हैं। आप किसी के पिता हो सकते हैं आप किसी के पति हो सकते हैं,ऐसे हजारों रूप आपके होते हैं । हर रूप के व्यक्ति के लिए आपकी अलग अलग छवि हो सकती है। व्यक्ति अपनी मूल भूत छवियों से अलग हटकर जीवन भर अपनी मायावी छवि को संतुष्ट करने में लगा रहता है। और यही मुख्या वजह है किसी भी व्यक्ति के परेशान होने की। आप कभी इस बात का जश्न नही मानते की आपने आज एक दिन और स्वस्थ गुजारा। आप अपनी नयी गाड़ी का जश्न मनाते हैं, आप आपने प्रमोशन का जश्न मनाते हैं।आपके लिए पद प्रतिष्ठा धन इत्यादि चीजों का अत्यधिक महत्त्व होता है। और इन चीजों के चले जाने पर आप उतना ही दुखी होतें है। पर निश्चय ही ये चीजें सिर्फ़ आपके मायावी शरीर को सुख पहुँचा सकतीं हैं। आपके सारे सुखों की उत्पात्ति क्रमश इन्ही शरीरों के स्वस्थ होने पर होती है। मायावी शरीर के सुख आपको छनिक सुख देंगे और जीवन भर आप इनके पीछे भागते रहेंगे। कारण शरीर आपको सिर्फ़ इसी जीवन का सुख देगा। जबकि सूचम शरीर आपको कभी न ख़त्म होने वाला आनंद देता है। इस सारे सुखों की मह्ह्त्ता उल्टे क्रम में शुरू होती है। अर्थात यदि आप का सुक्छ्म शरीर बीमार है तो आगे के सारे सुख, कारण शरीर के सुख और मायावी शरीर के सुख आपके लिए बेकार है। यदि कारण शरीर बेकार है तो सारे मायावी सुख बेकार है। इसको थोड़ा और विस्तृत करके बतातें है की यदि आपको तीव्र ज्वर है तो आप को स्वादिष्ट भोजन अच्छा नही लगेगा,आपको बड़े बड़े महल नही अच्छे लगेंगे। क्योंकि कारण शरीर दुखी है। ठीक इसी प्रकार जब आपकी अंतरात्मा दुखी होती है तो आपको ये जीवन अच्छा नही लगता है। अब इसी बात को उल्टे तरीके से कहें तो यही से सुखों का मार्ग मिलने लगता है......आप सर्वप्रथम अपने मन को खुश करें फ़िर शरीर को मायावी सुख तो अपने आप मिल जायेंगें। रेगिस्तान में जल का आभास होने पर हिरन किस प्रकार उसके पीछे व्याकुल हो कर भागता है। और फ़िर थक कर अपनी जान दे देता है। यदि उसे मृगतृष्णा का ज्ञान होता तो शायद इतना व्यथित होकर न मरता। जब भी आपको माया का ज्ञान हो जाए उसके पीछे भागिए जरूर लेकिन उसकी सच्चायी को जानते हुए। की इतनी मेहनत से पायी हुई मायावी चीजें चानिक सुख ही दे सकती हैं। जीवन अनमोल है और हर चन बदल रहा है किसी भी परेशानी के चन में आप महसूस कीजिये की आप एक स्वस्थ शरीर के मालिक हैं। और उस शरीर के खो जाने पर भी आप एक स्वस्थ आत्मा के मालिक हैं। अकबर सिकंदर से आप से ज्यादा दौड़ लगायी थी जिंदगी को पाने के लिए मगर अंत में वही एक आत्मा ले कर गए जो वो लेकर आए थे। खुशियाँ बिखरी पड़ी हैं जरूरत है महसूस करने की। अपने सबसे परेशानी के पल में आप किसी पेड़ भरे बाग़ में खड़े हो कर देखिये और उन्ही पलों में एक मर्सिडीज के बगल में खड़े हो के देखिये॥ कहाँ आपको सुकून मिलेगा निशचाई ही बाग़ में....कारण है उसका पेड़ में जीवन है पानी में जीवन है हवा में जीवन है, और जीवन ही जीवन का कष्ट समझ सकता है। ये नोटों के ,ये गाडियां ये ,बंगले कभी आपके कष्ट को नही समझ सकते और जो आपके कष्ट को समझ नही सकता वो आपको खुशी कैसे पहुँचा रहा है।
गुरुवार, 26 जून 2008
TIME AND SPACE
टाइम और स्पेस की कहानियाँ आपने सब ने खूब सुनी होंगी। आज चलिए मैं आपको एक नए दृष्टिकोण से इसकी परिभाषा समझाता हूँ। विज्ञानं और फिलोसफी का बड़ा गहरा सम्बन्ध है। किंतु विज्ञानं कहीं न कहीं मात खा जाता है। विज्ञानं लाख कोशिश कर ले किंतु इस मायावी जगत में हजारों ऐसी चीजें हैं जिनका वो सिर्फ़ प्रमाण दे सकता है जिनका भौतिक रूप दिखाने में वो असफल है। ऊर्जा, करेंट,हवा, प्राण,एटम, इत्यादि हजारों ऐसी चीजें हैं जहाँ पर विज्ञानं केवल प्रमाण दे सकता है। इसी क्रम में आइंस्टीन ने टाइम को एक विमा बताया यानि टाइम भी हर आदमी का अलग अलग होता है और इसे हम छोटा बड़ा कर सकते हैं।जैसे सुख का समय तुंरत कट जाता है और दुःख का समय देर से कटता है.समय वही लेकिन दो आदमियों के लिए अलग अलग . आइन्स्टीन ने इसे प्रयोगों के मध्यम से सिद्ध कर दिखाया था।अब बात आती है एक पूर्णतया नए विचार की अर्थात स्पेस की। जी हाँ स्पेस भी हर एक आदमी का अलग अलग होता। यही विचार धारा किसी मनीषी ने इस प्रकार दी थी की इस दुनिया में हजारों ब्रम्हांड हैं । बिल्कुल सत्य है.क्योंकि हर एक व्यक्ति अपने स्पेस से एक ब्रम्हांड की रचना कर रहा होता है। आप मेरी बात को दैनिक बातों से जोड़ सकते हैं कि हर आदमी का अपना एक नजरिया यानि नजर यानि एक दृष्टि क्षेत्र अर्थात एक स्पेस होता है.किंतु ये बात साइंस के नजरिये से भी उतनी ही सत्य है कि हर आदमी का अपना स्पेस अलग अलग होता है। इस स्पेस को वो छोटा बड़ा भी कर सकता है। आप जिंदगी भर इस दुनिया को मेरे स्पेस से नही देख सकते क्योंकि वो नजर पाने के लिए आपको राहुल की आँख चाहिए होगी और इसके लिए आपको राहुल बनाना पड़ेगा और आप अपने अस्तित्व खो कर मेरे स्पेस में आ जायेंगे। तब दुनिया को आप मेरे स्पेस से देखेंगे । वस्तुतः दुनिया एक है ऑंखें अनेक हैं। जो करोड़ों ऑंखें उसी एक स्पेस को देख कर करोड़ों ब्रम्हांड की रचना कर रही हैं। आँखों से तात्पर्य सिर्फ़ जैविक आँखों से ही नही है बल्कि उससे जुड़े मस्तिष्क और उसकी मष्तिष्क में होने वाले विश्लेषण से भी है। हर एक घटना के पीछे प्रत्येक आदमी का एक विश्लेषण होता है यानि वो उसी एक घटना को अपने ब्रम्हांड से देख कर विश्लेषित करता है। इसी परिदृश्य में थोड़ा और आगे चलते हैं मस्तिष्क का विश्लेषण किन किन चीजों पर निर्भर करता है। नयूरोंस की गतिविधियों पर दिमाग चलता है। मैं अपने सुधी पाठकों से निवेदन करना चाहूँगा की मेरे लेख जैविक आधार पर न पढ़ें यथा यदि मैं आंख की बात करता हूँ तो सिर्फ़ जैविक आँख की बात नही है बल्कि जैविक आँख से होनेवाली परलौकिक गतिविधियों की मैं बात कर रहा हूँ। मेरे लेखों का मुख्य आधार इस सृष्टि के सञ्चालन को समझना है। यदि ये दुनिया जैविक या भौतिक आधार पर समझी जाती तो हम भी किसी मेचकनिकल डिवाइस की भांति काम कर रहे होते। किंतु हम हमारे विचार ,हमारी गतिविधियाँ अत्यधिक अनिश्चित हैं। या तो ये किसी पूर्व निश्चित स्क्रिप्ट को प्ले करने के लिए हमारा अवतरण हुआ है। या फिर ये दुनिया पूर्णतया अनिश्चित है। एक मानव नाम का प्राणी कभी तो अपनी माँ को भगवन मान कर पूजता है। तो कभी अपनी इसी माँ नाम की देवी की हत्या करने वाला मानव भी उत्पन्न हुआ। आख़िर इतना अन्तर एक ही संरचना वाले प्राणी में क्यों। दोनों के हाथ पैर आँख कान नाक सब एक जैसे होते हैं ,बदला होता है तो सिर्फ़ उनका स्पेस और उस स्पेस में होनेवाली घटनाओं का विश्लेषण करने वाला मस्तिष्क। इसी मष्तिष्क के विश्लेषण से वो हर परिस्थितियो में व्यवहार करता है। मष्तिस्क का परिचालन विचारों द्वारा होता है। विचार और प्राण इस ब्रम्हांड में सर्वत्र व्याप्त हैं। गुत्त्थी यहीं उलझ जाती है कि ये प्राण और विचार मानव शरीर में कब और कैसे आतें हैं । कुंडली नामक विद्या द्वारा यही सिद्ध होता है कि इस जीवन में हर चीज पूर्व निर्धारित है. यानी इस सृष्टि की स्क्रिप्ट पहले से लिख दी गई है. अब आध्यात्मिक लोगो की खोज इस जीवन रूपी प्ले की स्क्रिप्ट लिखने वाले राईटर की है । जो जीवन की हर एक गतिविधियों को निश्चित करके रख ता है। और यदि आप उसे पढ़ना चाहें तो कुंडली के माध्यम से पढ़ भी सकते हैं। कुडली की विधा फ़िर कभी......अभी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही प्रश्न है की विचार कहाँ से आते हैं। अपने प्रयोगों के दौरान मैंने देखा की मैंने अपने जीवन के भविष्य के बारे में जानने के बावजूद ग़लत निर्णय लिए और नियति ने वही किया जो लिखा हुआ था। पढने और सुनने में काफी बचकाना लग रहा है की कोई व्यक्ति जानते बुझते ग़लत निर्णय क्यों लेगा लेकिन ऐसा ही हुआ। जब भी आप किसी निर्णय पर पहुचते हैं आप अपनी नियति का निर्धरण उसी छंद कर लेते है । आप का भविष्य का मार्ग उसी चढ़ निर्धरित हो चुका होता है। कर्म इत्यादि तो सिर्फ़ उस मार्ग पर चलने का दिखावा होता है। निर्णय किसी विचार से निर्धारित होता है. किसी भी निर्णय की प्रोबबिलिटी सिर्फ़ एक होती है. अर्थात किसी भी निर्णय में आप या तो हाँ कहेंगे या ना कहेंगे. मुद्दा फ़िर उलझ जाता है की आप यदि हाँ कहते हैं तो हाँ ही क्यूँ और ना कहते हैं तो ना ही क्यूँ . जवाब फ़िर वही है की आपकी नियति . जी हाँ जो की पूर्व निर्धारित है अर्थात आपका हां या ना बोलना भी पूर्व निर्धारित होता है. ये आपको आपका अहंकार बताता है कि ये निर्णय आप ले रहे है जबकि सच्चाई ये है कि वो निर्णय आप से दिलवाया जाता है. अगर आप अपने हां या ना का जवाब बदल देंगे तो आप की पूरी नियति बदल जायेगी. जबकि आपकी नियति पूर्व निर्धारित है.जिंदगी को इस नजरिये से देख कर आजमाईये.
रविवार, 22 जून 2008
BIO CLOCK N MENTAL PROCESOR
आज हम चर्चा करेंगे बायोलाजिकल क्लोक और मेंटल प्रोसेसर की। हमारे शरीर में इन दोनों के बीच में अद्भुत सम्नाजस्य होता है। बायोलोजिकल क्लोक अपने आस पास की गतिविधियाँ ,तापमान आदि चीजों को देख कर चलती है। आपने आस पास होने वाले परिवर्तनों पर उसकी पैनी नजर हमेशा बनी रहती है। हमारे शरीर के बूढे होने से लेकर अन्य सारी घटनाओ के लिए यही जिममेदार होती है.आप ने कई बार महसूस किया होगा कि बिना किसी पूर्व सूचना के आप को घटनाओ का आभास हो जाता है। आप सुबह बिना किसी अलारम के मनचाहे टाइम पर जग जाते हैं .निश्चित समय पर आपके दांत उग आते हैं आपके बाल सफ़ेद हो जाते हैं आप के चेहरे पे झुरियां पड़ने लगती हैं.ये सारे संदेश वही क्लोक आप पास के परिवेश को देख कर दिमाग को देती हैं। यानि मेंटल प्रोसेसर को देती है। दिमाग सम्बंधित शारीरिक विभाग को हारमोन के द्बारा संदेश देता है कि अब शरीर को जवान कर दो अब बाल उगा दो अब बूढा कर दो इत्यादि।आप बिना घड़ी देखे टाइम का अनुमान लेते हैं। ये सारी चीजें अनजाने में वही क्लोक कर रही होती है।चूँकि हम इस धरती के स्पिन से उसकी घूर्णन गति से जुड़े हुए हैं। अतः हम भी उसी प्रकार गति कर रहे हैं। अतैव हम इस रेफेरेंस फ्रेम के अभिन्न अंग हैं। अतः इस रेफेरेंस फ्रेम की सारे नियम हम पर उसी प्रकार लागू होंगे। यदि हम अपना रेफेरेंस फ्रेम बदल ले तो हमारी बायोलोजिकल क्लोक का रोटेशन भी बदल जाएगा.और वो हमारे दिमाग यानि मेंटल प्रोसेसर को भिन्न संदेश देने लगेगी.मान लें की अभी हमारी धरती पर २४ घंटे का एक रोटेशन होता है.अब हम किसी ऐसे ग्रह पर चले जाए जहाँ का रोटेशन २४० घंटे का हो तो ये क्लोक उसी प्रकार अपने आप को एडजस्ट कर के दिमाग पर संदेश भेजना शुरू करेगी। किंतु ये रोटेशन का परिवर्तन काफी कष्टकारी हो सकता है क्योंकि सदियों से हमारे जींस इस रोटेशन के आदी हो चुके हैं । हम लगता है की हम स्थिर हैं जबकि हम सदियों से काफी तेजी से रोटेट कर रहे हैं। जब हम २४० घंटे वाले रेफेरेंस फ्रेम में चले जायेंगे तो हमारी उम्र भी १० गुना बढ़ जायेगी क्योंकि मेंटेल प्रोसेसर उसी तरह से शारीरिक हारमोन को संदेश देगा की धीमे धीमे बूढे हो। यही कांसेप्ट ब्रह्मा जी की आयु के लिया लागू होता है।अब बात करते हैं योग द्वारा आयु बढ़ने की। किसी प्रकार यदि हम मेटल प्रोसेसर और इस क्लोक के बीच का सम्बन्ध समाप्त कर दें तो दिमाग बेवकूफ बन जाएगा उसे समय या आस पास की गतिविधियों का पता समय के अनुसार नही चल पायेगा। हम अपनी आयु के बीते हुए ५० साल को यदि अपने दिमाग को ५ साल बताएं तो वो शरीर में वृधि ५ साल की ही करेगा । और हम कई सौ साल तक जीवन जी सकतें है। ध्यान की गहन अवस्थाओं में जब आपका बाहरी दुनिया से सम्बन्ध कट जाता है तो बायोलोजिकल क्लोक को बाहरी दुनिया के संदेश मिलना बंद हो जाते हैं। आस पास के परिवर्तन , प्राकृतिक बदलाव को महसूस करने में वो असफल होने लगती है नतीजा दिमाग तक सही संदेश नही पहुँच पाटा और वो संदेश के इन्तेजार में शारीरिक बदलावों को सुस्त कर देता है। यही प्रक्रिया है जिससे योगी लोग अपनी उम्र कई सव सालों तक बढ़ा लेते थे। ये भ्रान्ति कई लोगो मैं है की समय स्थिर है जबकि समय एक विमा है dimension हैं जो अलग अलग लोगो के लिए अलग अलग निर्धारित हो सकता है।
गुरुवार, 19 जून 2008
PRAAN URJAA
मेरा मानना है की जीवन के लिए पञ्च तत्वों की जरुरत होती है जिसकी उर्जा से हम जीवित रह सकते है। बड़ा ही क्रांतिकारी विचार है। मेरे अनुसार प्राण ही मुख्या उर्जा है जिसके आधार पर हम सब जीवित है.पञ्च तत्वों का यदि संवर्धन होता रहे तो प्राण उर्जा चलती रहेगी। सम्पूर्ण सृष्टि एक वृत में चक्र काट रही है। जल नदी से समुद्र में समुद्र से बादलों तक और फ़िर बादलों से वापस भूमि पर आता है। पञ्च तत्व अपने रूप बदलते है किंतु जीवन के संचालन में मुख्य भूमिका इन्ही तत्वों की रहती है .इस विशाल ब्रहमांड की संरचना में गीता में कई लोको की अवधारणा दी गई है.
किंतु इसके अभी तक इसके वैज्ञानिक प्रमाण नही मिले है शिवलिंग की व्याख्या के तहत ब्रहम अंड को जब किसी स्पेस में रख दिया गया तो इस सृष्टि की रचना शुरू हुई.स्पेस और टाइम सृष्टि की शुरुवात में शून्य था। उसी बिन्दु से स्पेस और टाइम ने फैलना शुरू किया। वेदों के इस विचार को की हर एक आत्मा में परमात्मा है हम पुनः विज्ञानं के विचार से देखना शुरू करते है। सृष्टि की मुख्य आत्मा टाइम और स्पेस है। विज्ञानं ने सिद्ध कर दिया है कि हर व्यक्ति के लिए टाइम अलग अलग होता है। मेरा मानना है कि स्पेस भी हर एक व्यक्ति के लिए अलग अलग होता है. अर्थात वो जिस नजर से दुनिया को देखता है वो नजरिया अलग होता है.और इसी नजरिये के फर्क से विचारों कि भिन्नता उत्पन होती है और दुनिया संचालित होती है। स्पेस और टाइम घटाया बढाया जा सकता है। मेरी तर्क विज्ञानी पाठकों को कुछ ठीक से समझ में आ रहें होंगे.मुद्दा फ़िर वही आता है कि गीता की ब्रहम एंड की अवधारणा कितनी तर्क संगत है। जिसमे स्पश्ताया दिया गया है कि ४,३२,००० मानव वर्षों का ब्रह्म का एक दिन होता है। कुल सृष्टि के ५३,२५,००० अरब वर्षों के बाद प्रलय हो जायेगी। निश्चय ही इस बात कि तार्किकता कोई जाँच नही सकता, किंतु स्पेस और टाइम की अवधारणा का उस ग्रन्थ में होना इस बात की प्रमाणिकता है की इतने पुराने ग्रंथों में भी हम विज्ञान में काफ़ी आगे थे। चर्चा को आगे बढ़ते हुए मैं ये कहना चाहूँगा की यदि आप अपने समाज या दुनिया के इतर कुछ देखना चाहेंगे तो हमने उनकी दृष्टि से देखना होगा। अब यही बात हम साइंस की भाषा में kahen तो एक रेफेरेंस फ्रेम की सारी यूनिट और paristhitiyan अलग अलग होती हैं और एक रेफेरेंस फ्रेम को दुसरे से सम्बंधित करने के लिया हमें realtive yunit chahiye
किंतु इसके अभी तक इसके वैज्ञानिक प्रमाण नही मिले है शिवलिंग की व्याख्या के तहत ब्रहम अंड को जब किसी स्पेस में रख दिया गया तो इस सृष्टि की रचना शुरू हुई.स्पेस और टाइम सृष्टि की शुरुवात में शून्य था। उसी बिन्दु से स्पेस और टाइम ने फैलना शुरू किया। वेदों के इस विचार को की हर एक आत्मा में परमात्मा है हम पुनः विज्ञानं के विचार से देखना शुरू करते है। सृष्टि की मुख्य आत्मा टाइम और स्पेस है। विज्ञानं ने सिद्ध कर दिया है कि हर व्यक्ति के लिए टाइम अलग अलग होता है। मेरा मानना है कि स्पेस भी हर एक व्यक्ति के लिए अलग अलग होता है. अर्थात वो जिस नजर से दुनिया को देखता है वो नजरिया अलग होता है.और इसी नजरिये के फर्क से विचारों कि भिन्नता उत्पन होती है और दुनिया संचालित होती है। स्पेस और टाइम घटाया बढाया जा सकता है। मेरी तर्क विज्ञानी पाठकों को कुछ ठीक से समझ में आ रहें होंगे.मुद्दा फ़िर वही आता है कि गीता की ब्रहम एंड की अवधारणा कितनी तर्क संगत है। जिसमे स्पश्ताया दिया गया है कि ४,३२,००० मानव वर्षों का ब्रह्म का एक दिन होता है। कुल सृष्टि के ५३,२५,००० अरब वर्षों के बाद प्रलय हो जायेगी। निश्चय ही इस बात कि तार्किकता कोई जाँच नही सकता, किंतु स्पेस और टाइम की अवधारणा का उस ग्रन्थ में होना इस बात की प्रमाणिकता है की इतने पुराने ग्रंथों में भी हम विज्ञान में काफ़ी आगे थे। चर्चा को आगे बढ़ते हुए मैं ये कहना चाहूँगा की यदि आप अपने समाज या दुनिया के इतर कुछ देखना चाहेंगे तो हमने उनकी दृष्टि से देखना होगा। अब यही बात हम साइंस की भाषा में kahen तो एक रेफेरेंस फ्रेम की सारी यूनिट और paristhitiyan अलग अलग होती हैं और एक रेफेरेंस फ्रेम को दुसरे से सम्बंधित करने के लिया हमें realtive yunit chahiye
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