गुरुवार, 24 जुलाई 2008

प्रकाश और विचार

प्रकाश की एक की किरण सूरज से चलती है इस सृष्टि की किसी चीज पर गिरती है और परावर्तित होकर हमारी आंखों तक आती है आँखें दिमाग को संदेश भेजती हैं और दिमाग अपने अनुभव के आधार पर उस चीज को पहचान लेता है।

एक विचार परम ब्रह्म से चलता है किसी पदार्थ पर गिरता है परावर्तित होकर हमारे मस्तिष्क तक आता है दिमाग उस विचार को विश्लेषित करता है और अपने अनुभवों के आधार पर हमें कोई काम करने की प्रेरणा देता है।

दो एक जैसी घटनाएं एक को हम मान लेते है क्योंकि वैज्ञानिकों ने इसे प्रयोग द्वारा सिद्ध कर दिया । दूसरे को हम नही मानते क्योंकि वैज्ञानिकों ने इस दिशा में कभी काम ही नही किया । पहली घटना के रास्ते में बहुत सी भौतिक चीजें पड़ती हैं जिसका भौतिक सत्यापन एवं विश्लेषण किया जा सकता है। और वैज्ञानिकों को अपनी उपलब्धि गिनवाने के लिए भौतिक विश्लेषण आसान जान पड़ता है. आप आंख देख सकते है आप चीजों को देख सकते हैं। किंतु दूसरी घटना के रास्ते में कुछ भी भौतिक नही है और जो भौतिक है यानी दिमाग वो इंतना जटिल है कि वैज्ञानिकों ने आज तक उस से तौबा कर रखी है। और उससे किनारा काटते आयें हैं। इस दिशा में हमारे ऋषि मुनियों ने काफ़ी शोध किया था। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दो अलग अलग विचार धाराएँ हैं वैज्ञानिक विचार धारा में अपने आँख नाक कान हमेशा खुले रखने पड़ते हैं और निरंतर इस माया रुपी संसार को निरखते परखते रहना पड़ता है। जबकि आध्यात्मिक मार्ग में अपने आँख नाक कान हमेशा बंद रखने पड़ते हैं और इस माया रुपी संसार से हमेशा दूर रहना पड़ता है। दो विचार धाराएँ हैं, मार्ग अलग अलग हैं, इसी लिए दोनों एक दूसरे को दोषी ठहराते रहते हैं किंतु ये निश्चित है कि सत्य सत्य ही रहेगा । जिस दिन भी वो उजागर होगा वो एक ही रहेगा भले ही हम किसी भी मार्ग को क्यों न अपनाएँ ।
हम पुनः अपने प्रयोग कि ओर चले।
विचार और प्रकाश का तुलनात्मक अध्ययन-
शायद हम में से किसी ने भी प्रकाश को नही देखा है , जी हाँ हम प्रकाश को नही देखते बल्कि प्रकाश से प्रकाशित होने वाली वस्तुओं को देखते है। और तब प्रकाश का अस्तित्व आसानी से मान लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आपकी पाँच इन्द्रियां सिर्फ़ उस सतरंगी प्रकाश को देखने में ही समर्थ हैं। लेकिन जनाब दुनिया आपकी पाँच इन्द्रियों से पहले भी है और बाद में भी है। आपके बगल में बैठा कुत्ता दूर से आती अलटावायलेट तरंगों को सुन लेता है। और आप बहरे व्यक्तियों कि भांति बैठे रहते हैं । आप कुत्ते से ज्यादा समर्थ हैं किंतु सिर्फ़ पाँच इन्द्रियों तक सीमित हैं। एक और आश्चर्य जनक सत्य मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ये रंगीन दुनिया आप रंगीन प्रकाश में देखते हैं किंतु जानवरों के लिए ये दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट है। जी हाँ जानवरों के पास रंगों के प्रति सवेदनशीलता नही होती है। मेरा कहने का मतलब ये है कि दुनिया सिर्फ़ वही नही है जो कि आप द्वेखते हैं। किसी गाय कि दुनिया अलग होगी किसी मेढक कि दुनिया अलग होगी।
जिस प्रकार प्रकाश कि प्रतिक्रिया के लिए आंखों का होना आवश्यक है उसी प्रकार विचार कि प्रतिक्रिया के लिए दिमाग का होना आवश्यक है। इस दुनिया में सबसे तेज प्रकाश कि गति होती है और उससे तेज विचार कि गति होती है। जब आप किसी वस्तु को देखते हैं तो इस देखने कि प्रक्रिया में ऐसा नही कि आपकी आंखों से कोई प्रकाश निकल रहा होता है या फ़िर वो वस्तु ख़ुद अपने को प्रकाशित कर रही होती है। बल्कि कहीं और से प्रकाश आकर उस पर गिरता है जिसका परावर्तन और विश्लेषण आपके मस्तिष्क में होता तब आप दुनिया देखते हैं। ठीक इसी प्रकार विचार न तो आपका मस्तिष्क उत्पन्न करता है न वो वस्तु उत्पन्न करती है जिसे आप देख रहे होते हैं। बल्कि विचार kahiin और से आकर उस वस्तु पर गिरता है और उसका परावर्तन और विश्लेषण आपके मस्तिष्क में होता है और तब दुनिया चलती है। किसी लड़की को देख कर उस पर मोहित हो उठना आपकी बहादुरी नही है बल्कि एक विचार उस लड़की पर गिरता है और वो परावर्तित होकर आपके मस्तिष्क में आता है जिसका विश्लेषण आपका दिमाग करके प्रतिक्रिया उत्पन्न कर देता है।सारे कर्म आपके विचार पर आधारित हैं और आपके विचारों पर आपका कोई नियंत्रण नही है।ये कहीं और से आ रहे हैं.और ये पूर्व निर्धारित है. आपका दिमाग सिर्फ़ इन्हे विश्लेषित कर रहा है और आपका अहंकार आपको ये जताता है कि ये सब आप कर रहे हैं। एक टी.वी सिर्फ़ अपने चैनल को दिखा सकता है उसके सिगनाल को बदल नही सकता .क्योंकि वो पूर्व निर्धारित हैं. अब अगर टी. वी. में अहंकार भर दे तो वो सोचेगा कि ये चैनल तो मैं दिखा रहा हूँ जबकि वो सिर्फ़ दूर से आने वाले सिग्नलों को रूपांतरित कर रहा होता है. इसी प्रकार तुलनात्मक अध्ययन मेंआपको एक और उदाहरण देना चाहूँगा कि जब आप किसी माध्यम के द्वारा सारे रंगों को रोक देते है और सिर्फ़ एक रंग के प्रकाश को अन्दर बाहर आने जाने देते है तो तो दुनिया आपको वैसी ही नजर आती है या यूँ कहें की उसी रंग की नजर आती है। मान ले आप किसी लाल रंग के कांच वाले बंद कमरे में बैठ जाते हैं तो दुनिया आपको लाल रंग की नजर आती है। और बाहरी दुनिया ले लोग भी आपको लाल रंग का समझते हैं। ठीक इसी प्रकार जब आप आध्यात्मिक होकर किसी विचार की परत अपने चारो ओर लगा लेते हैं तो आप वैसे ही बन जाते हैं । गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक उपलब्धि ऐसे ही एक विचार की परिणित थी जिस विचार ने उन्हें आजीवन घेरे रखा । उन्होंने शान्ति के विचार की परत अपने चारों ओर लगा ली थी । जिससे बाकी सारे विचार परावर्तित हो जाते थे और उन तक केवल शान्ति के विचार ही पहुच पाते थे। और वे लोगो तक केवल शान्ति के विचार ही पहुँचा पाते थे। ठीक उसी प्रयोग की तरह जो लाल कांच के कमरे पर आधारित था। सृष्टि के आरम्भ में ऊर्जा का रूपांतरण कई भागों में हुआ गतिज उर्जा ,सिथितिज उर्जा ,प्रकाश उर्जा , और उन्ही में एक है विचार ऊर्जा। विचार उर्जा को भी प्रकाश उर्जा की भांति गति के लिए माध्यम की आवश्यकता नही होती । आप सब ने सुना और देखा कि सूरज धरती का जीवन दाता है। जिस क्षण सूरज नही रहेगा दुनिया नष्ट हो जायेगी । अब यदि कल्पना कीजिये कि जिस क्षण दुनिया के सारे लोग विचार शून्य हो जायेंगे उस क्षण भी दुनिया रूक जायेगी या यूँ कहें कि नष्ट हो जायेगी । विचार ऊर्जा जीवन के लिए ज्यादा आवश्यक है। विचार उर्जा के से हमने हवाई जहाज और रॉकेट बना लिए , किसी दिन इसी विचार ऊर्जा से हम ये धरती छोड़ किसी दूसरे ग्रह पर भी जा सकते हैं.या फ़िर जीवन ऊर्जा के लिए प्रकाश के बजाये कोई और माध्यम दूंढ ले , किंतु विचार ऊर्जा के बिना ये सब असंभव है किंतु प्रश्न फ़िर वही उठता है कि ये विचार आते कहाँ से हैं?..............

मंगलवार, 8 जुलाई 2008

चयन की स्वतंत्रता

आप भले ही न माने की हम सब आपस में इंटर कनेक्टेड हैं लेकिन विज्ञानं ये मान चुका है। जी हाँ । ये हम सब जानते हैं की प्रत्येक अणू के मूलभूत परमाणु आपस में जोड़े में होते हैं। जो आपस में एक दूसरे के विपरीत अपने अक्ष गति कर रहे होते हैं यानि यदि एक +१/२ दिशा में गति कर रहा है तो दूसरा -१/२ दिशा में गति कर रहा होगा। अब वैज्ञानिको ने उपकरणों की मदद से उन दोनों को अलग अलग कर दिया और उन दोनों को लाखों किलो मीटर दूर कर दिया फ़िर किस प्रकार से उन्होंने एक मूलभूत परमाणु की गति बदल दी यानि जो +१/२ दिशा में गति कर रहा था उसको -१/२ दिशा में गति करवानी शुरू कर दी। उन्होंने एक चमत्कारिक परिणाम देखा की दूसरे मूलभूत परमाणु ने जो उनके कक्ष से काफ़ी दूर था उसने स्वत अपने अक्ष पर अपनी गति बदल दी। ये अभी ज्ञात नही हो पाया है की इतनी दूर उस दूसरे परमाणु को कैसे पता चला की मेरे जोडीदार ने अपनी गति की दिशा बदल दी है। जब इतने मूलभूत परमाणु आपस में संवाद रखते है तो उनसे बनी दुनिया भी निश्चित ही आपस में संवाद रखती होगी। क्यों आपको अचानक कोई चीज अच्छी लगने लगती है, क्यों किसी से अचानक प्यार हो जाता। मेरे विचार से ना केवल हम सब आपस में सम्बन्ध रखते हैं, बल्कि कोई बाहरी शक्ति भी है जो हमे आपस में जोड़े रखती है। मेरा कुंडली की विधा में काफी रूचि है । इस विधा के अध्यन में मैंने ये पाया की कुण्डलियाँ निश्चित ही होती है और प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य पूर्व निर्धारित होता है। अब प्रशन ये उठता है की यदि सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या औचित्य है। मेरे विचार से ये सिर्फ़ अहंकार को संतुष्ट करने का तरीका है। ताकि दुनिया संचालित होती रहे और आपको ये न लगे की सब कुछ यदि निश्चित है तो कर्म क्यों किया जाए .अगर आप कर्म नही करेंगे तो निशचय ही दुनिया रुक जायेगी.इसीलिए आप के मष्तिष्क में अहंकार भर दिया गया की आपको ये लगे की आप इस दुनिया को संचालित कर रहे हैं. ये सिर्फ़ प्रतीति मात्र है की ये चीजें मेरे करने से हो रही है। आपके इस बियोलोजिकल शरीर में आपका दिमाग सिर्फ़ आपका विचार ऊर्जा को पदार्थ उर्जा में परिवर्तित करने का एक मात्र साधन है इस सृष्टि में फैले विचारों को वो पढता है और उन्हें नए अविष्कारों के मध्यम से पदार्थ में परिवर्तित कर देता है। इतिहास गवाह है की नयी नयी खोजें सिर्फ़ एक विचार से हुई हैं। ये विचार ही हैं जो किसी को हिटलर और किसी को गाँधी बनते हैं, जबकि सभी जीव विज्ञानं की दृष्टि से बराबर हाथ पैर और आंख नाक मुह वाले थे। अन्तर था तो सिर्फ़ उनके विचारों का। इसी क्रम में आगे बढ़ने पर ये प्रश्न उठा है की क्या आप किसी विचार के द्बारा कोई निर्णय लेने में समर्थ हैं। क्या आपको चयन की स्वतंत्रता है... मेरा मतलब की यदि आप I.A.S. बनने का निर्णय लेते हैं तो क्या आप I.A.S. बन सकते हैं मेरा जवाब है नही। यदि आप के कुंडली में I.A.S. बनना नही लिखा है तो आप कभी I.A.S. नही बन सकते क्योंकि आपके विचार कभी ऐसे बन ही नही पायेंगे। कभी आप को
सांसारिक चीजें परेशान करेंगी तो कभी आप का ध्यान कही और चला जाएगा और आप लाख प्रयत्नों के बाद भी अपने चयन को पाने के लिए स्वतंत्र नही होंगे। लेकिन जब आपकी कुंडली में I.A.S.बनना लिखा होगा तो आप अचानक निर्णय ले लेंगे और सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने निर्णय को पा लेंगे। क्योंकि आपका दिमाग उस समय सिर्फ़ और सिर्फ़ I.A.S. से सम्बंधित विचारों को ही ग्रहण करेगा। आपका संपूर्ण व्यक्तित्व आपके विचारों से ही बनता है। आज तक शायद ही किसी बाप ने अपने बेटे से कहा होगा की बेटा तुम बड़े होकर चोर या डाकू बनना हर माता पिता अपने बच्चे को बहुत होनहार बनाना चाहता है फ़िर भी इस दुनिया में चोर डाकू हैं .जब किसी व्यक्ति ने चोर या डाकू बन ने का निर्णय नही लिया तो फ़िर ये लोग आए कहाँ से। ये हमारे चयन की स्वतन्त्रता नही है, चोर बनने का निर्णय हमारा नही था जो सिद्ध करता है की कुछ चीजें इस दुनिया में हमारे निर्णय के विपरीत भी आती हैं। हर एक व्यक्ति का भविष्य और जीवन पथ निर्धारित है और वो उसी के अनुसार निर्णय लेता है। और फ़िर अपनी नियति को पहुँच जाता है। यदि आप अपनी नियति से संघर्ष करेंगे तो जीवन भर परेशान रहेंगे और यदि उसे स्वीकार कर लेंगे तो आजीवन सुखी रहेंगे। किंतु ये अहंकार हमें निरंतर संघर्ष कराता रहता है और हम अपनी नियति से इतर बन्ने की चेष्टा करते रहते हैं उसे स्वीकार नही करते यही हमारे दुखों का कारण हैं। नीम का पेड़ आजीवन नीम ही रहेगा ,वो लाख चेष्टा कर ले। सूरज चाँद सब किसी न किसी अनुशाषान से बंधे हैं । आप अपने जीवन को बिल्कुल भी बदल नही सकते हाँ इसके काल चक्र का आनद उठा सकते हैं।और आप निश्चित ही माने की इस दुनिया को आपकी भी बहुत जरुरत है अगर आप न होते तो ये दुनिया अधूरी होती। ये विचार मैं आप तक क्यों पहुँचा रहा हूँ मुझे ख़ुद नही मालूम लेकिन ये जरूर है की सृष्टि के इस प्रोसेस में मैं अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी के साथ निभा रहा हूँ। तो आप भी जिंदगी का मजा उठाइए और इस सृष्टि में अपनी भूमिका पुरी ईमानदारी से निभाइए। ।

सोमवार, 30 जून 2008

शरीर के प्रकार

शरीर तीन प्रकार का होता है। सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर , मायावी शरीर। आपने सूक्ष्म शरीर के बारे में सुना होगा। सूक्ष्म शरीर यानी आत्मा इसकी गहराईयों में जाने में इसके कई प्रकार और मिलते हैं। मन,प्राण,चेतना इत्यादि इसमे शामिल होते हैं। कारण शरीर जिसमें आपके हाथ पैर नाक कान इत्यादि आतें हैं। जिसके अस्वथय होने पर आपको डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती है। एक स्वस्थ जीवन शैली अपना कर आप इसको स्वस्थ रख सकते हैं।तीसरा प्रकार होता है मायावी शरीर का। मायावी शरीर वो होता है जिस रूप में आपको दुनिया देखती है। आपकी वाह्य अवस्था। आपका पद,आपका रूप रंग इत्यादि .ये सब चीजें आपके मायावी शरीर के अंतर्गत आती हैं। आप किसी के पिता हो सकते हैं आप किसी के पति हो सकते हैं,ऐसे हजारों रूप आपके होते हैं । हर रूप के व्यक्ति के लिए आपकी अलग अलग छवि हो सकती है। व्यक्ति अपनी मूल भूत छवियों से अलग हटकर जीवन भर अपनी मायावी छवि को संतुष्ट करने में लगा रहता है। और यही मुख्या वजह है किसी भी व्यक्ति के परेशान होने की। आप कभी इस बात का जश्न नही मानते की आपने आज एक दिन और स्वस्थ गुजारा। आप अपनी नयी गाड़ी का जश्न मनाते हैं, आप आपने प्रमोशन का जश्न मनाते हैं।आपके लिए पद प्रतिष्ठा धन इत्यादि चीजों का अत्यधिक महत्त्व होता है। और इन चीजों के चले जाने पर आप उतना ही दुखी होतें है। पर निश्चय ही ये चीजें सिर्फ़ आपके मायावी शरीर को सुख पहुँचा सकतीं हैं। आपके सारे सुखों की उत्पात्ति क्रमश इन्ही शरीरों के स्वस्थ होने पर होती है। मायावी शरीर के सुख आपको छनिक सुख देंगे और जीवन भर आप इनके पीछे भागते रहेंगे। कारण शरीर आपको सिर्फ़ इसी जीवन का सुख देगा। जबकि सूचम शरीर आपको कभी न ख़त्म होने वाला आनंद देता है। इस सारे सुखों की मह्ह्त्ता उल्टे क्रम में शुरू होती है। अर्थात यदि आप का सुक्छ्म शरीर बीमार है तो आगे के सारे सुख, कारण शरीर के सुख और मायावी शरीर के सुख आपके लिए बेकार है। यदि कारण शरीर बेकार है तो सारे मायावी सुख बेकार है। इसको थोड़ा और विस्तृत करके बतातें है की यदि आपको तीव्र ज्वर है तो आप को स्वादिष्ट भोजन अच्छा नही लगेगा,आपको बड़े बड़े महल नही अच्छे लगेंगे। क्योंकि कारण शरीर दुखी है। ठीक इसी प्रकार जब आपकी अंतरात्मा दुखी होती है तो आपको ये जीवन अच्छा नही लगता है। अब इसी बात को उल्टे तरीके से कहें तो यही से सुखों का मार्ग मिलने लगता है......आप सर्वप्रथम अपने मन को खुश करें फ़िर शरीर को मायावी सुख तो अपने आप मिल जायेंगें। रेगिस्तान में जल का आभास होने पर हिरन किस प्रकार उसके पीछे व्याकुल हो कर भागता है। और फ़िर थक कर अपनी जान दे देता है। यदि उसे मृगतृष्णा का ज्ञान होता तो शायद इतना व्यथित होकर न मरता। जब भी आपको माया का ज्ञान हो जाए उसके पीछे भागिए जरूर लेकिन उसकी सच्चायी को जानते हुए। की इतनी मेहनत से पायी हुई मायावी चीजें चानिक सुख ही दे सकती हैं। जीवन अनमोल है और हर चन बदल रहा है किसी भी परेशानी के चन में आप महसूस कीजिये की आप एक स्वस्थ शरीर के मालिक हैं। और उस शरीर के खो जाने पर भी आप एक स्वस्थ आत्मा के मालिक हैं। अकबर सिकंदर से आप से ज्यादा दौड़ लगायी थी जिंदगी को पाने के लिए मगर अंत में वही एक आत्मा ले कर गए जो वो लेकर आए थे। खुशियाँ बिखरी पड़ी हैं जरूरत है महसूस करने की। अपने सबसे परेशानी के पल में आप किसी पेड़ भरे बाग़ में खड़े हो कर देखिये और उन्ही पलों में एक मर्सिडीज के बगल में खड़े हो के देखिये॥ कहाँ आपको सुकून मिलेगा निशचाई ही बाग़ में....कारण है उसका पेड़ में जीवन है पानी में जीवन है हवा में जीवन है, और जीवन ही जीवन का कष्ट समझ सकता है। ये नोटों के ,ये गाडियां ये ,बंगले कभी आपके कष्ट को नही समझ सकते और जो आपके कष्ट को समझ नही सकता वो आपको खुशी कैसे पहुँचा रहा है।

गुरुवार, 26 जून 2008

TIME AND SPACE

टाइम और स्पेस की कहानियाँ आपने सब ने खूब सुनी होंगी। आज चलिए मैं आपको एक नए दृष्टिकोण से इसकी परिभाषा समझाता हूँ। विज्ञानं और फिलोसफी का बड़ा गहरा सम्बन्ध है। किंतु विज्ञानं कहीं न कहीं मात खा जाता है। विज्ञानं लाख कोशिश कर ले किंतु इस मायावी जगत में हजारों ऐसी चीजें हैं जिनका वो सिर्फ़ प्रमाण दे सकता है जिनका भौतिक रूप दिखाने में वो असफल है। ऊर्जा, करेंट,हवा, प्राण,एटम, इत्यादि हजारों ऐसी चीजें हैं जहाँ पर विज्ञानं केवल प्रमाण दे सकता है। इसी क्रम में आइंस्टीन ने टाइम को एक विमा बताया यानि टाइम भी हर आदमी का अलग अलग होता है और इसे हम छोटा बड़ा कर सकते हैं।जैसे सुख का समय तुंरत कट जाता है और दुःख का समय देर से कटता है.समय वही लेकिन दो आदमियों के लिए अलग अलग . आइन्स्टीन ने इसे प्रयोगों के मध्यम से सिद्ध कर दिखाया था।अब बात आती है एक पूर्णतया नए विचार की अर्थात स्पेस की। जी हाँ स्पेस भी हर एक आदमी का अलग अलग होता। यही विचार धारा किसी मनीषी ने इस प्रकार दी थी की इस दुनिया में हजारों ब्रम्हांड हैं । बिल्कुल सत्य है.क्योंकि हर एक व्यक्ति अपने स्पेस से एक ब्रम्हांड की रचना कर रहा होता है। आप मेरी बात को दैनिक बातों से जोड़ सकते हैं कि हर आदमी का अपना एक नजरिया यानि नजर यानि एक दृष्टि क्षेत्र अर्थात एक स्पेस होता है.किंतु ये बात साइंस के नजरिये से भी उतनी ही सत्य है कि हर आदमी का अपना स्पेस अलग अलग होता है। इस स्पेस को वो छोटा बड़ा भी कर सकता है। आप जिंदगी भर इस दुनिया को मेरे स्पेस से नही देख सकते क्योंकि वो नजर पाने के लिए आपको राहुल की आँख चाहिए होगी और इसके लिए आपको राहुल बनाना पड़ेगा और आप अपने अस्तित्व खो कर मेरे स्पेस में आ जायेंगे। तब दुनिया को आप मेरे स्पेस से देखेंगे । वस्तुतः दुनिया एक है ऑंखें अनेक हैं। जो करोड़ों ऑंखें उसी एक स्पेस को देख कर करोड़ों ब्रम्हांड की रचना कर रही हैं। आँखों से तात्पर्य सिर्फ़ जैविक आँखों से ही नही है बल्कि उससे जुड़े मस्तिष्क और उसकी मष्तिष्क में होने वाले विश्लेषण से भी है। हर एक घटना के पीछे प्रत्येक आदमी का एक विश्लेषण होता है यानि वो उसी एक घटना को अपने ब्रम्हांड से देख कर विश्लेषित करता है। इसी परिदृश्य में थोड़ा और आगे चलते हैं मस्तिष्क का विश्लेषण किन किन चीजों पर निर्भर करता है। नयूरोंस की गतिविधियों पर दिमाग चलता है। मैं अपने सुधी पाठकों से निवेदन करना चाहूँगा की मेरे लेख जैविक आधार पर न पढ़ें यथा यदि मैं आंख की बात करता हूँ तो सिर्फ़ जैविक आँख की बात नही है बल्कि जैविक आँख से होनेवाली परलौकिक गतिविधियों की मैं बात कर रहा हूँ। मेरे लेखों का मुख्य आधार इस सृष्टि के सञ्चालन को समझना है। यदि ये दुनिया जैविक या भौतिक आधार पर समझी जाती तो हम भी किसी मेचकनिकल डिवाइस की भांति काम कर रहे होते। किंतु हम हमारे विचार ,हमारी गतिविधियाँ अत्यधिक अनिश्चित हैं। या तो ये किसी पूर्व निश्चित स्क्रिप्ट को प्ले करने के लिए हमारा अवतरण हुआ है। या फिर ये दुनिया पूर्णतया अनिश्चित है। एक मानव नाम का प्राणी कभी तो अपनी माँ को भगवन मान कर पूजता है। तो कभी अपनी इसी माँ नाम की देवी की हत्या करने वाला मानव भी उत्पन्न हुआ। आख़िर इतना अन्तर एक ही संरचना वाले प्राणी में क्यों। दोनों के हाथ पैर आँख कान नाक सब एक जैसे होते हैं ,बदला होता है तो सिर्फ़ उनका स्पेस और उस स्पेस में होनेवाली घटनाओं का विश्लेषण करने वाला मस्तिष्क। इसी मष्तिष्क के विश्लेषण से वो हर परिस्थितियो में व्यवहार करता है। मष्तिस्क का परिचालन विचारों द्वारा होता है। विचार और प्राण इस ब्रम्हांड में सर्वत्र व्याप्त हैं। गुत्त्थी यहीं उलझ जाती है कि ये प्राण और विचार मानव शरीर में कब और कैसे आतें हैं । कुंडली नामक विद्या द्वारा यही सिद्ध होता है कि इस जीवन में हर चीज पूर्व निर्धारित है. यानी इस सृष्टि की स्क्रिप्ट पहले से लिख दी गई है. अब आध्यात्मिक लोगो की खोज इस जीवन रूपी प्ले की स्क्रिप्ट लिखने वाले राईटर की है । जो जीवन की हर एक गतिविधियों को निश्चित करके रख ता है। और यदि आप उसे पढ़ना चाहें तो कुंडली के माध्यम से पढ़ भी सकते हैं। कुडली की विधा फ़िर कभी......अभी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही प्रश्न है की विचार कहाँ से आते हैं। अपने प्रयोगों के दौरान मैंने देखा की मैंने अपने जीवन के भविष्य के बारे में जानने के बावजूद ग़लत निर्णय लिए और नियति ने वही किया जो लिखा हुआ था। पढने और सुनने में काफी बचकाना लग रहा है की कोई व्यक्ति जानते बुझते ग़लत निर्णय क्यों लेगा लेकिन ऐसा ही हुआ। जब भी आप किसी निर्णय पर पहुचते हैं आप अपनी नियति का निर्धरण उसी छंद कर लेते है । आप का भविष्य का मार्ग उसी चढ़ निर्धरित हो चुका होता है। कर्म इत्यादि तो सिर्फ़ उस मार्ग पर चलने का दिखावा होता है। निर्णय किसी विचार से निर्धारित होता है. किसी भी निर्णय की प्रोबबिलिटी सिर्फ़ एक होती है. अर्थात किसी भी निर्णय में आप या तो हाँ कहेंगे या ना कहेंगे. मुद्दा फ़िर उलझ जाता है की आप यदि हाँ कहते हैं तो हाँ ही क्यूँ और ना कहते हैं तो ना ही क्यूँ . जवाब फ़िर वही है की आपकी नियति . जी हाँ जो की पूर्व निर्धारित है अर्थात आपका हां या ना बोलना भी पूर्व निर्धारित होता है. ये आपको आपका अहंकार बताता है कि ये निर्णय आप ले रहे है जबकि सच्चाई ये है कि वो निर्णय आप से दिलवाया जाता है. अगर आप अपने हां या ना का जवाब बदल देंगे तो आप की पूरी नियति बदल जायेगी. जबकि आपकी नियति पूर्व निर्धारित है.जिंदगी को इस नजरिये से देख कर आजमाईये.

रविवार, 22 जून 2008

BIO CLOCK N MENTAL PROCESOR

आज हम चर्चा करेंगे बायोलाजिकल क्लोक और मेंटल प्रोसेसर की। हमारे शरीर में इन दोनों के बीच में अद्भुत सम्नाजस्य होता है। बायोलोजिकल क्लोक अपने आस पास की गतिविधियाँ ,तापमान आदि चीजों को देख कर चलती है। आपने आस पास होने वाले परिवर्तनों पर उसकी पैनी नजर हमेशा बनी रहती है। हमारे शरीर के बूढे होने से लेकर अन्य सारी घटनाओ के लिए यही जिममेदार होती है.आप ने कई बार महसूस किया होगा कि बिना किसी पूर्व सूचना के आप को घटनाओ का आभास हो जाता है। आप सुबह बिना किसी अलारम के मनचाहे टाइम पर जग जाते हैं .निश्चित समय पर आपके दांत उग आते हैं आपके बाल सफ़ेद हो जाते हैं आप के चेहरे पे झुरियां पड़ने लगती हैं.ये सारे संदेश वही क्लोक आप पास के परिवेश को देख कर दिमाग को देती हैं। यानि मेंटल प्रोसेसर को देती है। दिमाग सम्बंधित शारीरिक विभाग को हारमोन के द्बारा संदेश देता है कि अब शरीर को जवान कर दो अब बाल उगा दो अब बूढा कर दो इत्यादि।आप बिना घड़ी देखे टाइम का अनुमान लेते हैं। ये सारी चीजें अनजाने में वही क्लोक कर रही होती है।चूँकि हम इस धरती के स्पिन से उसकी घूर्णन गति से जुड़े हुए हैं। अतः हम भी उसी प्रकार गति कर रहे हैं। अतैव हम इस रेफेरेंस फ्रेम के अभिन्न अंग हैं। अतः इस रेफेरेंस फ्रेम की सारे नियम हम पर उसी प्रकार लागू होंगे। यदि हम अपना रेफेरेंस फ्रेम बदल ले तो हमारी बायोलोजिकल क्लोक का रोटेशन भी बदल जाएगा.और वो हमारे दिमाग यानि मेंटल प्रोसेसर को भिन्न संदेश देने लगेगी.मान लें की अभी हमारी धरती पर २४ घंटे का एक रोटेशन होता है.अब हम किसी ऐसे ग्रह पर चले जाए जहाँ का रोटेशन २४० घंटे का हो तो ये क्लोक उसी प्रकार अपने आप को एडजस्ट कर के दिमाग पर संदेश भेजना शुरू करेगी। किंतु ये रोटेशन का परिवर्तन काफी कष्टकारी हो सकता है क्योंकि सदियों से हमारे जींस इस रोटेशन के आदी हो चुके हैं । हम लगता है की हम स्थिर हैं जबकि हम सदियों से काफी तेजी से रोटेट कर रहे हैं। जब हम २४० घंटे वाले रेफेरेंस फ्रेम में चले जायेंगे तो हमारी उम्र भी १० गुना बढ़ जायेगी क्योंकि मेंटेल प्रोसेसर उसी तरह से शारीरिक हारमोन को संदेश देगा की धीमे धीमे बूढे हो। यही कांसेप्ट ब्रह्मा जी की आयु के लिया लागू होता है।अब बात करते हैं योग द्वारा आयु बढ़ने की। किसी प्रकार यदि हम मेटल प्रोसेसर और इस क्लोक के बीच का सम्बन्ध समाप्त कर दें तो दिमाग बेवकूफ बन जाएगा उसे समय या आस पास की गतिविधियों का पता समय के अनुसार नही चल पायेगा। हम अपनी आयु के बीते हुए ५० साल को यदि अपने दिमाग को ५ साल बताएं तो वो शरीर में वृधि ५ साल की ही करेगा । और हम कई सौ साल तक जीवन जी सकतें है। ध्यान की गहन अवस्थाओं में जब आपका बाहरी दुनिया से सम्बन्ध कट जाता है तो बायोलोजिकल क्लोक को बाहरी दुनिया के संदेश मिलना बंद हो जाते हैं। आस पास के परिवर्तन , प्राकृतिक बदलाव को महसूस करने में वो असफल होने लगती है नतीजा दिमाग तक सही संदेश नही पहुँच पाटा और वो संदेश के इन्तेजार में शारीरिक बदलावों को सुस्त कर देता है। यही प्रक्रिया है जिससे योगी लोग अपनी उम्र कई सव सालों तक बढ़ा लेते थे। ये भ्रान्ति कई लोगो मैं है की समय स्थिर है जबकि समय एक विमा है dimension हैं जो अलग अलग लोगो के लिए अलग अलग निर्धारित हो सकता है।

गुरुवार, 19 जून 2008

PRAAN URJAA

मेरा मानना है की जीवन के लिए पञ्च तत्वों की जरुरत होती है जिसकी उर्जा से हम जीवित रह सकते है। बड़ा ही क्रांतिकारी विचार है। मेरे अनुसार प्राण ही मुख्या उर्जा है जिसके आधार पर हम सब जीवित है.पञ्च तत्वों का यदि संवर्धन होता रहे तो प्राण उर्जा चलती रहेगी। सम्पूर्ण सृष्टि एक वृत में चक्र काट रही है। जल नदी से समुद्र में समुद्र से बादलों तक और फ़िर बादलों से वापस भूमि पर आता है। पञ्च तत्व अपने रूप बदलते है किंतु जीवन के संचालन में मुख्य भूमिका इन्ही तत्वों की रहती है .इस विशाल ब्रहमांड की संरचना में गीता में कई लोको की अवधारणा दी गई है.
किंतु इसके अभी तक इसके वैज्ञानिक प्रमाण नही मिले है शिवलिंग की व्याख्या के तहत ब्रहम अंड को जब किसी स्पेस में रख दिया गया तो इस सृष्टि की रचना शुरू हुई.स्पेस और टाइम सृष्टि की शुरुवात में शून्य था। उसी बिन्दु से स्पेस और टाइम ने फैलना शुरू किया। वेदों के इस विचार को की हर एक आत्मा में परमात्मा है हम पुनः विज्ञानं के विचार से देखना शुरू करते है। सृष्टि की मुख्य आत्मा टाइम और स्पेस है। विज्ञानं ने सिद्ध कर दिया है कि हर व्यक्ति के लिए टाइम अलग अलग होता है। मेरा मानना है कि स्पेस भी हर एक व्यक्ति के लिए अलग अलग होता है. अर्थात वो जिस नजर से दुनिया को देखता है वो नजरिया अलग होता है.और इसी नजरिये के फर्क से विचारों कि भिन्नता उत्पन होती है और दुनिया संचालित होती है। स्पेस और टाइम घटाया बढाया जा सकता है। मेरी तर्क विज्ञानी पाठकों को कुछ ठीक से समझ में आ रहें होंगे.मुद्दा फ़िर वही आता है कि गीता की ब्रहम एंड की अवधारणा कितनी तर्क संगत है। जिसमे स्पश्ताया दिया गया है कि ४,३२,००० मानव वर्षों का ब्रह्म का एक दिन होता है। कुल सृष्टि के ५३,२५,००० अरब वर्षों के बाद प्रलय हो जायेगी। निश्चय ही इस बात कि तार्किकता कोई जाँच नही सकता, किंतु स्पेस और टाइम की अवधारणा का उस ग्रन्थ में होना इस बात की प्रमाणिकता है की इतने पुराने ग्रंथों में भी हम विज्ञान में काफ़ी आगे थे। चर्चा को आगे बढ़ते हुए मैं ये कहना चाहूँगा की यदि आप अपने समाज या दुनिया के इतर कुछ देखना चाहेंगे तो हमने उनकी दृष्टि से देखना होगा। अब यही बात हम साइंस की भाषा में kahen तो एक रेफेरेंस फ्रेम की सारी यूनिट और paristhitiyan अलग अलग होती हैं और एक रेफेरेंस फ्रेम को दुसरे से सम्बंधित करने के लिया हमें realtive yunit chahiye